फ़िल्म रिव्यू

रचित गुप्ताकलंक स्टोरी: यह उलझी हुई कहानी है देश के बंटवारे के समय की, जहां पति देव (आदित्य रॉय कपूर) के सम्मान और ज़फर (वरुण धवन) के प्यार के बीच खूबसूरत रूप (आलिया भट्ट) के भी टुकड़े हो जाते हैं। हालांकि, एक तरफ जहां उनकी पिछली जिंदगी और दिल टूटने वाली प्रेम कहानी का खुलासा
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अगर आपको याद हो तो साल 1980 में इसी नाम से एक फिल्म आई थी जिसमें नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म की कहानी एक मिडिल क्लास शख्स के इर्दगिर्द घूमती थी, जिसे छोटी-छोटी बात पर जल्दी गुस्सा आ जाता था। एकबार फिर अब जब इसी टाइटल पर मानव कौल स्टारर
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कई बार कहानियां कहते-कहते, कहानी कहने वाला इतना उलझ जाता है कि क्लाइमैक्स तक आते-आते कहानी कहीं भटक जाती है और फिल्म को कलात्मक बनाने के चक्कर में उसकी सृजनात्मकता खो जाती है। निर्देशक राकेश रंजन कुमार की ‘पहाड़गंज’ भी उन्हीं कहानियों में से एक है। स्पैनिश लड़की लॉरा कॉस्टा (लोरिना फ्रेंको) अपने बॉयफ्रेंड रॉबर्ट
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इतिहास के विवादास्पद पहलुओं को दिखाना एक फिल्मकार की क्रिऐटिव आजादी हो सकती है और निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने उसी क्रिऐटिव फ्रीडम के तहत ‘द ताशकंद फाइल्स‘ पर फिल्म बनाई। फिल्म इतिहास के सर्वाधिक कॉन्ट्रोवर्शल अध्याय यानी स्वतंत्र देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शात्री की मौत के इर्दगिर्द बुनी गई है, जहां पर सवाल
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कलाकार और फिल्मकार के रूप में जॉन अब्राहम का जबरदस्त ट्रांसफॉर्मेशन हुआ है और यह रूपांतरण उनकी ‘विकी डोनर’, ‘मद्रास कैफे’ और पिछली फिल्म ‘परमाणु’ में देखने को मिला। इस बार रॉ अर्थात ‘रोमियो अकबर वॉल्टर’ के जरिए एक बार फिर वे देशभक्ति की बात करते हैं। वे हमें ले जाते हैं 1971 के दौर
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रिव्यू: एक जमाना था जब कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता था, मगर एक अरसे से पृथ्वी का स्वर्ग कहलाने वाले कश्मीर की हालत अब इतनी बदतर होती जा रही है कि कोई उसके स्याह पहलू पर बात नहीं करना चाहता। कुछ अरसे से फिल्मकार कश्मीर के प्रति संवेदनशील हुए हैं और वहां के
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टाइम्स न्यूज नेटवर्क, Thu,28 Mar 2019 22:18:37 +05:30 हमारी रेटिंग 3 / 5 पाठकों की रेटिंग 3 / 5 कलाकारजहीर इकबाल,प्रनूतन बहल निर्देशक नितिन कक्कड़ मूवी टाइपरोमांस
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इंसान चूंकि ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ कृति है, तो यह उसका फर्ज़ है कि वह संसार की दूसरी निरीह और लुप्त होती प्रजातियों का संरक्षण करे, उन्हें प्रोटेक्ट करे। जानवरों को प्रेम दें और हाथियों का संरक्षण करें, मूल रूप से हॉलिवुड के निर्देशक चक रसेल की फिल्म यही संदेश देती है और साथ ही
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धार्मिक उन्माद जब भी अपने चरम पर होता है, विध्वंसकारी बन जाता है और इतिहास में ऐसे कई किस्से दर्ज हैं, जब धर्म को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करके कत्लेआम किया गया है। निर्देशक अनीश डेनियल निर्देशित ‘द लीस्ट ऑफ दीज: द ग्राहम स्टेन्स स्टोरी’ ऐसी ही दिल दहला देनीवाली वास्तविक घटना पर आधारित
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हाथी और इंसान की दोस्ती और प्यार की कहानी का जिक्र हो तो साल 1971 में आई राजेश खन्ना और तनुजा स्टारर फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ की याद सबसे पहले आती है। अब कई सालों बाद, इस शुक्रवार को एक साथ ऐसी दो फिल्में रिलीज हो रही हैं, जिसके केंद्र में हाथी और इंसान की
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‘दुनिया में सबको जिंदगी में कुछ न कुछ कमी है, मगर कमियों को मिलाकर ही जिंदगी बनती है। मैं जैसी हूं, वैसी हूं।’ निर्देशक कासिम खालो की फिल्म ‘गॉन केश‘ में यह डायलॉग फिल्म की नायिका क्लाइमैक्स में बोलती है। यही फिल्म का सार है। एनाक्षी (श्वेता त्रिपाठी) एलोपेशिया जैसी रेयर बीमारी से पीड़ित है,
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रेणुका व्यवहारेकहानी: सूर्या (अभिमन्यु दासानी) को एक दुर्लभ सुपरहीरो की बीमारी है, जिसकी वजह से उसे दर्द का भी एहसास नहीं होता। इस बीमारी की वजह से उसे सोसाइटी में कहीं भी फिट नहीं माना जाता। वह यह सोचकर बड़ा होता है कि वह एक कराटेमैन है और उसे समाज के गलत लड़कों को सबक
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रचित गुप्ता‘केसरी’ कहानी है साल 1897 में हुई सारागढ़ी की लड़ाई की जहां केवल 21 सिख सैनिकों ने 10,000 अफगानों की फौज का डटकर सामना किया था। इस लड़ाई को मानवीय इतिहास की सबसे ज्यादा बहादुरी से लड़ी गई लड़ाइयों में से एक माना जाता है। आज भी केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया
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सेल्फी और इंस्टाग्राम के चट क्लिक, पट अपडेट के इस दौर में कभी दराज में पड़ी एक पुरानी फोटो हाथ लग जाए, तो आंखों में चमक और चेहरे पर मुस्कान आए बिना रह ही नहीं सकती। निर्देशक रितेश बत्रा ने अपनी ताजातरीन फिल्म फोटोग्राफ से दर्शकों की आंखों में वही चमक और चेहरे पर वही
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आपने जब ‘हासिल’, ‘पान सिंह तोमर’ और ‘साहब बीवी और गैंग्सटर’ जैसी अर्थपूर्ण फिल्में बनाई हों तो आपसे उम्मीदों और अपेक्षाओं का होना तो बनता है, मगर आप रोमांटिक ड्रामा को चटपटा बनाने के चक्कर में उसमें इतने मसाले डाल देते हैं कि जायका बिगड़ जाता है। हम बात कर रहे हैं, तिग्मांशु धूलिया की
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कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में क्रिटिकली अक्लेम्ड ‘हामिद’ को देखते हुए दर्शक को समझना होगा कि यह आम बॉलिवुड मसाला फिल्म नहीं है, मगर जब आप इस फिल्म को देखना शुरू करते हैं, तो अल्लाह और कश्मीर के मुद्दों पर सात साल के मासूम बच्चे हामिद के सवाल आपको विचलित करते हैं और प्री क्लाइमेक्स
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