फ़िल्म रिव्यू

इरफान खान की वापसी का फैन्स को बेसब्री से इंतजार था। जाहिर है, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से क्योर होकर इरफान ने जबसे इस फिल्म की शूटिंग शुरू की थी, तभी से उनके चाहनेवाले फिल्म की बाट जोह रहे थे। इसमें कोई दो राय नहीं कि इरफान ने अपने फैन्स को इस फिल्म में उम्मीद
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यह सच है कि हिंदी फिल्मों में ऐक्शन की तूती बोलती है और आमतौर पर किसी बदले की भावना या करीबी रिश्ते के लिए फिल्मी पर्दे पर मार-धाड़ करते हीरो द्वारा जब विलन या गुंडों की धुनाई होती है तो ऑडियंस खूब इंजॉय करती है। निर्देशक अहमद खान ने भी भाई को बचानेवाले और दहशतगर्दी
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हीरो, हिरोइन और विलेन के बगैर हिंदी फिल्म की कल्पना नहीं की जा सकती, मगर जिस तरह से आलू हर सब्जी में खप जाता है, उसी तरह से हिंदी सिनेमा के सह-चरित्र अदाकार वह प्रजाति होते हैं, जिनके बगैर हिंदी फिल्म की कहानी आगे नहीं बढ़ सकती, मगर सैकड़ों फिल्में करने बावजूद वे अपनी जमीन
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निर्देशक गगनपुरी ने ‘दूरदर्शन’ के रूप में कॉमिडी और आधुनिक रिश्तों के ताने-बाने को दर्शाने के लिए दूरदर्शन जैसे मजेदार विषय को चुना तो सही, मगर कमजोर स्क्रीनप्ले और कहानी के कारण वे मजे को बरकरार नहीं रख पाए। वह चाहते तो इस विषय के साथ बहुत खूबसूरती से प्ले कर सकते थे। कहानी: घर
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बस एक थप्पड़ ही तो था। क्या करूं? हो गया ना। ज्यादा जरूरी सवाल है ये है कि ऐसा हुआ क्यों? बस इसी ‘क्यों’ का जवाब तलाशती है अनुभव सिन्हा की ये फिल्म थप्पड़। इसका ट्रेलर आपने देखा होगा तो कहानी का मोटा अंदाजा लग गया होगा कि अमृता (तापसी पन्नू) कैसे अपने पति विक्रम
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रोज हमें लड़ाई लड़नी पड़ती है जिंदगी में, पर जो लड़ाई परिवार के साथ होती है, वो सारी लड़ाई सबसे बड़ी और खतरनाक होती है। आनंद एल राय निर्मित और हितेश केवल्या निर्देशित ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ का यह डायलॉग समलैंगिक कम्युनिटी की बेबसी और संघर्ष को बयां करता है। वाकई आज भले कानून ने
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आज से तकरीबन 17 साल पहले रिलीज़ हुई राम गोपाल वर्मा की ‘भूत’ को भारतीय सिनेमा की यादगार हॉरर फिल्मों में गिना जाता है। इसीलिए जब सालों बाद धर्मा जैसा बड़ा प्रॉडक्शन हाउस विकी कौशल जैसे समर्थ कलाकर के साथ इसी शीर्षक वाली ‘भूत’ लेकर आता है, तो दर्शक के रूप में आपको लगता है
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आपने आमतौर पर सोशल मीडिया पर युवाओं के रिलेशनशिप स्टेटस के आगे पढ़ा होगा ‘इट्स कॉम्प्लिकेटेड’। इम्तियाज अली की ‘लव आज कल’ भी प्यार और रिलेशनशिप के उसी कॉम्प्लिकेशंस को दर्शाती है। प्यार जटिल होता है और वो परफेक्ट नहीं हो सकता। इम्तियाज ने इसी तर्ज पर ‘लव आज कल’ को बुना है। आज से
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बीस साल पहले निर्माता-निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा रितिक-संजय दत्त अभिनीत ‘मिशन कश्मीर’ लाए थे। एक बार फिर वे शिकारा के जरिए दर्शकों को नब्बे के उस दशक में ले चलते हैं, जब तकरीबन 4 लाख कश्मीरी पंडितों को अपने घरों से निकाल कर विस्थापित कर दिया गया था। फिल्म के संवेदनशील विषय के कारण फिल्म
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टाइम्स न्यूज नेटवर्क, Thu,6 Feb 2020 09:48:30 +05:30 हमारी रेटिंग 3.5 / 5 पाठकों की रेटिंग 3.5 / 5 कलाकारआदित्य रॉय कपूर,अनिल कपूर,दिशा पाटनी,कुणाल खेमू निर्देशक मोहित सूरी मूवी टाइपRomance,Action,Drama अवधि2 घंटा 14 मिनट
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‘हैपी हार्डी ऐंड हीर‘ बतौर ऐक्टर हिमेश रेशमिया की यह दसवीं फिल्म है। कलाकार के रूप में अपनी खूबियों-खामियों को जानते हुए उन्होंने खुद को दमदार संगीत के साथ डबल रोल में पेश किया है। परदे पर उन्हें दोहरी भूमिका में देखकर यह अंदाजा हो जाता है कि उन्होंने अपने अभिनय पक्ष पर कड़ी मेहनत
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पल्लबी डे पुरकायस्थपाकिस्तानी सोशल ऐक्टिविस्ट और नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई के जीवन पर यह फिल्म ‘गुल मकई‘ बनाई गई है। इसका निर्देशन एच.ई. अमजद खान ने किया है। मलाला पर बनी इस फिल्म का फैंस को बेसब्री से इंतजार था। कहानी: ‘गुल मकई’ की कहानी पाकिस्तानी नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफ़ज़ई के जीवन और
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नितिन कक्कर के डायरेक्शन में बनी ‘जवानी जानेमन‘ समाज में रिश्तों के बदलते पैमानों की कहानी है। आप इसे यूथ सेंट्रिक फिल्म कह सकते हैं। रिश्तों का जो मॉडर्न रूप इस फिल्म में नजर आता है, उसे जस्टिफाइ करने के लिए निर्देशक ने स्वदेशी किरदारों के साथ विदेशी पृष्ठभूमि को चुनने की समझदारी दिखाई है।
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‘बैड बॉयज’ के रूप में ढाई दशक पहले स्क्रीन पर धमाका करने वाले जाबांज पुलिसवालों माइक लॉउरी (विल स्मिथ) और मार्कस ब्रुनेट (मार्टिन लॉरेंस) की जोड़ी साल 2003 में आयी ‘बैड बॉयज 2’ के 17 साल बाद एक बार फिर ‘बैड बॉयज फॉर लाइफ‘ में लौट आई है। उम्र बढ़ने के साथ ये बैड बॉयज
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रेमो डिसूजा की ‘स्ट्रीट डांसर 3 डी’ को अगर डांस की विजुअल ट्रीट कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इस तरह की कोरियॉग्रफी और हैरतअंगेज डांस स्टेप्स हमने अब तक बॉलिवुड की फिल्मों में नहीं देखे हैं, मगर जितनी अथक मेहनत रेमो ने डांस के क्राफ्ट पर की, उतनी ही अगर वह कहानी पर करते
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‘मैं एक मां हूं और मां के कोई सपने नहीं होते।’ अश्विनी अय्यर तिवारी निर्देशित ‘पंगा’ के इस डायलॉग से हर वो औरत खुद को जुड़ा हुआ पाएगी, जिसने अपने घर-परिवार और बच्चों के लिए अपने सपनों को भुलाकर अपनी पहचान तक खो दी हो। फिर फिल्म में एक संवाद और आता है, जहां नायिका
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