नन्ही दुनिया

* शिक्षक – एक अनोखा किरदार शिक्षक ईश्वर का दिया हुआ वह उपहार है, जो बिना किसी स्वार्थ व भेद भाव के अपने हर शिष्य को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने का प्रयास करता है। शिक्षक का दर्जा हमेशा से ही पूजनीय रहा है। एक शिष्य के लिए उसके शिक्षक की बताई हुई बात पत्थर
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– ब्रह्मानंद राजपूत शिक्षक समाज में उच्च आदर्श स्थापित करने वाला व्यक्तित्व होता है। किसी भी देश या समाज के निर्माण में शिक्षा की अहम् भूमिका होती है, कहा जाए तो शिक्षक समाज का आइना होता है। हिन्दू धर्म में शिक्षक के लिए कहा गया है कि आचार्य देवो भवः यानी कि शिक्षक या आचार्य
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मदर टेरसा रोमन कैथोलिक नन थीं जिनके पास भारतीय नागरिकता थी। मात्र 18 वर्ष की उम्र में लोरेटो सिस्टर्स में दीक्षा लेकर वे सिस्टर टेरेसा बनीं थी। उनका जन्म यूगोस्लाविया के स्कॉप्जे में 26 अगस्त 1910 को हुआ था। उनका असली नाम एग्नेस गोंझा बोयाजिजू ही था, जो बाद में ‘मदर टेरेसा’ बनीं।  फिर वे
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बिना गुरु के ज्ञान संभव नहीं और बिना ज्ञान के विजय संभव नहीं। जब से इस सृष्टि की संरचना हुई, तब से ही यह परिपाटी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। जो शिक्षक होते हैं, उन्हें सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में रखा गया है। प्राचीनकाल की गुरुकुल की शिक्षा से लेकर आज की कलयुगी शिक्षा तक का
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भारत व अन्य देशों में समाज निर्माण के लिए शिक्षक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शिक्षक एक सभ्य समाज के निर्माण में मजबूत स्तंभ होते हैं। हमारे यहां शिक्षक होना गर्व की बात होती है, इसलिए कई माता-पिता अपने बच्चों को बड़े होने पर शिक्षक बनने की सलाह देते हैं। एक शिक्षक के रूप में करियर
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ज्ञान की बात हो, योग्यता की या फिर बेहतर इंसान होने की, इन सभी मामलों में शिक्षक हमारे जीवन में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन ज्ञान के साथ-साथ कुछ और भी योग्यताएं हैं जो एक शिक्षक को अपने आप में बेहतरीन और स्टूडेंट्स का पसंदीदा बनाती हैं। जानिए ऐसी ही 5 खूबियां जो आपको
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वैसे तो टीचर अपने आप में सर्वश्रेष्ठ होता है और उसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती। लेकिन चूंकि दुनिया में हर चीज के लिए पैमाने बना दिए गए हैं, तो शिक्षा का क्षेत्र इससे कैसे अछूता रह सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में पढ़ाने का तरीका बेहद मायने रखता है, जो शिक्षक की
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राजा भद्रसिंह प्रजापालक एवं न्यायप्रिय थे। नैतिक और जीवन मूल्यों के प्रति बहुत जागरूक थे किंतु उनका पुत्र महाउत्पाति, विद्रोही, उदंड एवं निर्दयी था। वह प्रतिदिन नए-नए उपद्रवों से लोगों को पीड़ित किए रखता था। राजपुत्र होने के कारण उसकी शिकायत करने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता था। इसका फायदा उठाकर वह निरंकुश होता
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हमारी जिंदगी में कुछ लोगों का स्थान ऐसा होता है जिसकी तुलना हम किसी से नहीं कर सकते हैं। हमारे पौराणिक धर्मग्रंथों में गुरु (शिक्षक) को भगवान से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। शिक्षक हमें पढ़ना-लिखना सिखाते हैं, सही-गलत में भेदभाव करना और जीवन पथ पर अग्रसर रहने का रास्ता दिखाते हुए हमें ऊंचाइयों
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-सुशील शर्मा शिक्षा मनुष्य को देवत्व प्रदान करती है। -विवेकानंद शिक्षा सुसंस्कृत बनाने का माध्यम है। यह हमारी संवेदनशीलता और दृष्टि को प्रखर करती है जिससे राष्ट्रीय एकता पनपती है, वैज्ञानिक तरीके के अमल की संभावना बढ़ती है और समझ और चिंतन में स्वतंत्रता आती है। साथ ही शिक्षा हमारे संविधान में प्रतिष्ठित समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता
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गुरु है बड़ गोविन्द तें मन में देखुं विचार। हरि सुमिरें सो वार है गुरु सुमिरै सो पार।। गुरु (शिक्षक) ही गोविंद का मिलाप कराते हैं। गुरु, गोविन्द से बढ़कर हैं। मन में जो हरि व गुरु को भजता है, उसकी जीवनरूपी नैया पार हो जाती है। नवभक्ति में भी पंचम भक्ति ही सतगुरु (शिक्षक)
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– बाबूराव जोशी डॉ. राधाकृष्णन अपनी बुद्धिमतापूर्ण व्याख्याओं, आनंददायी अभिव्यक्ति और हंसाने, गुदगुदाने वाली कहानियों से अपने छात्रों को मंत्रमुग्ध कर दिया करते थे। वे छात्रों को प्रेरित करते थे कि वे उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारें। वे जिस विषय को पढ़ाते थे, पढ़ाने के पहले स्वयं उसका अच्छा अध्ययन करते थे।
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प्रस्तावना – गुरु-शिष्य परंपरा भारत की संस्कृति का एक अहम और पवित्र हिस्सा है। जीवन में माता-पिता का स्थान कभी कोई नहीं ले सकता, क्योंकि वे ही हमें इस रंगीन खूबसूरत दुनिया में लाते हैं। कहा जाता है कि जीवन के सबसे पहले गुरु हमारे माता-पिता होते हैं। भारत में प्राचीन समय से ही गुरु
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फिल्मों में मास्टरजी को सामान्य व्यक्ति के रूप में बहुत कम दिखाया जाता है। टीचर के रूप में या तो उसे बेहद लाचार और कमजोर बताते हैं, जो कुरता-पजामा पहने, हाथ में छड़ी पकड़े, चश्मा लगाए, टूटी-फूटी साइकिल पर सवार होकर आदर्शवादी बातें करता रहता है या फिर वह आला दर्जे का बेवकूफ रहता है।
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गफूर स्नेही साइकिल हाथ में छाते के साथ में कपड़े की थैली है उजली मटमैली है कंधे पर बैग है वही मंथर वेग है खाना-पानी संग है उड़ा हुआ रंग है अफसर से तंग है नीति कर्म में जंग है गांव तो चाहता है विभाग न चाहता है बदली की धमकी है सरपंच की घुड़की
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– डॉ. सुलोचना बगाना है आज बहुत हर्षि‍त मन मेरा, शि‍क्षक दि‍वस है पर्व सुनहरा। इस पुलकि‍त पावन अवसर पर,वंदन करता है मन मेरा।। आपकी महि‍मा आपका गौरवआपका चिंतन आपका ज्ञान। आपके ही उपदेश वचनकरते हैं सबका कल्‍याण।। आपकी गरि‍मा का क्‍या बखान करें,आपके गौरव का कैसे गुणगान करें। डरती है लेखनी मेरी,न कहीं कोई
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