नन्ही दुनिया

भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षाकाल में ही उन्होंने एक ऐसे अध्यापक के विरुद्ध आंदोलन खड़ा कर उन्हें सही मार्ग दिखाया, जो अपने ही व्यापारिक संस्थान से पुस्तकें क्रय करने के लिए छात्रों को बाध्य करते थे। सन्‌ 1908 में वे
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1. ‘लौहपुरुष’सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ। वे खेड़ा जिले के कारमसद में रहने वाले झावेर भाई और लाडबा पटेल की चौथी संतान थे। 1897 में 22 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। वल्लभ भाई की शादी झबेरबा से हुई। पटेल जब सिर्फ
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भारत त्योहारों का देश है, जहां सभी समुदाय के लोग मिल-झुल कर विभिन्न प्रकार के त्योहार मनाते है। दिवाली, होली, राखी की ही तरह क्रिसमस भी एक खास पर्व है, जो वैसे तो क्रिश्चियन समुदाय के लोगों का पर्व है लेकिन अन्य धर्मों के लोग भी इसे मनाते है। इस दिन स्कूलों में छुट्टी होती
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हम 60 साल से भी ज्यादा समय से मानव अधिकार दिवस मना रहे हैं। यह दिन प्रतिवर्ष 10 दिसंबर को मनाते हैं। इस दिवस पर हम क्या ऐसा करने वाले है जो हमारे समाज और राष्ट्र को गौरवान्वित करेगा। लेकिन इन सबके पहले यह जानना अतिआवश्यक है कि आखिर मानव अधिकार आयोग क्या है और
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सामान्य जीवन यापन के लिए प्रत्येक मनुष्य के अपने परिवार, कार्य, सरकार और समाज पर कुछ अधिकार होते हैं, जो आपसी समझ और नियमों द्वारा निर्धारित होते हैं। इसी के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 10 दिसंबर 1948 को सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणापत्र को आधिकारिक मान्यता दी गई, जिसमें भारतीय संविधान द्वारा प्रत्येक मनुष्य को कुछ
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झंडा दिवस यानी देश की सेना के प्रति सम्मान प्रकट करने का दिन। यह प्रतिवर्ष 7 दिसंबर को सशस्त्र सेना झंडा दिवस मनाया जाता है। उन जांबाज सैनिकों के प्रति एकजुटता दिखाने का दिन, जो देश की तरफ आंख उठाकर देखने वालों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए। सेना में रहकर जिन्होंने न केवल
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डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर की अद्वितीय प्रतिभा अनुकरणीय है। वे एक मनीषी, योद्धा, नायक, विद्वान, दार्शनिक, वैज्ञानिक, समाजसेवी एवं धैर्यवान व्यक्तित्व के धनी थे। वे अनन्य कोटि के नेता थे, जिन्होंने अपना समस्त जीवन समग्र भारत की कल्याण कामना में उत्सर्ग कर दिया। खासकर भारत के 80 फीसदी दलित सामाजिक व आर्थिक तौर से अभिशप्त
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निधन : 28 फरवरी 1963 भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद सादगी पसंद, दयालु एवं निर्मल स्वभाव के व्यक्ति थे। उनका जन्म 3 दिसंबर 1884 को हुआ था। उनके पिता का नाम महादेव सहाय एवं माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। पिता फारसी और संस्कृत भाषाओं के विद्वान तो माता धार्मिक महिला थीं। बचपन
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एक बार की बात है, एक राज्य का एक राजा हुआ करता था, उसके पास एक सुन्दर सा तोता था। वह तोता बड़ा चतुर और बुद्धिमान था इस वजह से ही राजा उससे बहुत खुश रहता था। एक दिन तोता राजा से विनती करने लगा कि उसे अपने माता-पिता से मिलने जाना है। राजा ने
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एक छात्र जिसे शून्य अंक मिले, आश्चर्यचकित था क्योंकि उसके सभी उत्तर उसे सही लग रहे थे। आप ही उसके जवाब पढ़े और मूल्यांकन कीजिए प्रश्न 1 – किस लड़ाई में टीपू सुल्तान मारे गए? उत्तर- अपनी आखिरी लड़ाई में। प्रश्न 2- स्वतंत्रता के घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर कहां हुए? उत्तर- पृष्ठ के निचले भाग
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एक दिन सर ने बच्चे से पूछा – स्कूल क्या है ?? बहुत ही शानदार जवाब मिला . . स्कूल वो जगह है, जहां पर हमारे डैड को लूटा जाता है और हमें कूटा जाता है ..!!
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एक मंदिर था। उसमें सब लोग पगार पर काम करते थे। आरती वाला, पूजा कराने वाला आदमी, घंटा बजाने वाला भी पगार पर था… घंटा बजाने वाला आदमी आरती के समय भाव के साथ इतना मशगुल हो जाता था कि होश में ही नहीं रहता था। घंटा बजाने वाला व्यक्ति भक्ति भाव से खुद का
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एक बार कि बात है, एक कक्षा में गुरूजी अपने सभी छात्रों को समझाना चाहते थे कि प्रकर्ति सभी को समान अवसर देती हैं और उस अवसर का इस्तेमाल करके अपना भाग्य खुद बना सकते है। इसी बात को ठीक तरह से समझाने के लिए गुरूजी ने तीन कटोरे लिए। पहले कटोरे में एक आलू
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जन्म : 22 नवंबर 1830 मृत्यु : 4 अप्रैल 1857 झलकारी बाई का जन्म बुंदेलखंड के एक गांव में 22 नवंबर को एक निर्धन कोली परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सदोवा (उर्फ मूलचंद कोली) और माता जमुनाबाई (उर्फ धनिया) था। झलकारी बचपन से ही साहसी और दृढ़ प्रतिज्ञ बालिका थी। बचपन से
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शीत लहर में आंगन वाले, बड़ के पत्ते हुए तर बतर। चारों तरफ धुंध फैली है, नहीं कामवाली है आई। और दूध वाले भैया ने, नहीं डोर की बैल बजाई। झाड़ू पौंछा कर मम्मी ने, साफ कर लिया है खुद ही घर। दादा दादी को दीदी ने, बिना दूध की चाय पिलाई। कन टोपा और
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भूमिका : गाय का यूं तो पूरी दुनिया में ही काफी महत्व है, लेकिन भारत के संदर्भ में बात की जाए तो प्राचीन काल से यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। चाहे वह दूध का मामला हो या फिर खेती के काम में आने वाले बैलों का। वैदिक काल में गायों की संख्‍या
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