नन्ही दुनिया

प्रस्तावना : भारतीय वसुंधरा को गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई वास्तविक अर्थ में आदर्श वीरांगना थीं। सच्चा वीर कभी आपत्तियों से नहीं घबराता है। प्रलोभन उसे कर्तव्य पालन से विमुख नहीं कर सकते। उसका लक्ष्य उदार और उच्च होता है। उसका चरित्र अनुकरणीय होता है। अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए
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Last Updated: सोमवार, 1 अक्टूबर 2018 (15:48 IST) 2 अक्टूबर, 1904 को मुगलसराय, उत्तरप्रदेश में लाल बहादुर शास्त्री का जन्म ‘मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव’ के यहां हुआ था। उनकी माता का नाम ‘रामदुलारी’ था। लाल बहादुर शास्त्री के पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। ऐसे में सब उन्हें ‘मुंशी जी’ ही कहते थे। बाद में
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एक बार गांधी जी एक छोटे से गांव में पहुंचे तो उनके दर्शनों के लिए लोगों की भीड़ उमड़ी। गांधीजी ने लोगों से पूछा, ‘इन दिनों आप कौन-सा अन्न बो रहे हैं और किस अन्न की कटाई कर रहे हैं?’ तभी भीड़ में से एक वृद्ध व्यक्ति आगे आया और करबद्ध हो बोला, ‘आप तो
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके जीवन के प्रेरणादायी प्रसंग बहुत ही रोचक और शिक्षाप्रद है। आइए यहां पढ़ें गांधीजी के जीवन से जुड़े कुछ खास प्रसंग :- पहला प्रसंग :- एक बार एक मारवाड़ी सज्जन गांधीजी से मिलने आए। उन्होंने सिर पर बड़ी-सी पगड़ी बांध रखी थी। वे गांधीजी से
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देश के लिए मर मिटने वाले देशभक्तों में भगत सिंह का नाम भुलाया नहीं जा सकता। देश के प्रति उनका प्रेम, दीवानगी और मर मिटने का भाव, उनके शेर-ओ-शायरी और कविताओं में साफ दिखाई देता है, जो आज भी युवाओं में आज भी जोश भरने का काम करता है। पढ़ें भगत सिंह के वतन पर
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यदि मैं बिलकुल अकेला भी होऊं तो भी सत्य और अहिंसा पर दृढ़ रहूंगा क्योंकि यही सबसे आला दर्जे का साहस है जिसके सामने एटम बम भी अप्रभावी हो जाता है। – गांधीजी ऐसे हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख आध्यात्मिक एवं राजनैतिक नेता थे। * अछूतोद्धार, सर्वधर्म-समन्वय और विशेष कर
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‘दे दी हमें आजादी, बिना खड्‍ग बिना ढाल। साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।’ प्रस्तावना- हमारा देश महान स्त्रियों और पुरुषों का देश है जिन्होंने देश के लिए ऐसे आदर्श कार्य किए हैं जिन्हें भारतवासी सदा याद रखेंगे। कई महापुरुषों ने हमारी आजादी की लड़ाई में अपना तन-मन-धन परिवार सब कुछ अर्पण कर दिया।
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एक बार गुरु रामानंद ने कबीर से कहा कि हे कबीर! आज श्राद्ध का दिन है और पितरों के लिए खीर बनानी है।आप जाइए, पितरों की खीर के लिए दूध ले आइए…। कबीर उस समय 9 वर्ष के ही थे। वे दूध का बरतन लेकर चल पड़े। चलते-चलते रास्ते में उन्हें एक गाय मरी हुई
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सरदार भगत सिंह का नाम अमर शहीदों में सबसे प्रमुख रूप से लिया जाता है। भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को पंजाब के जिला लायलपुर में बंगा गांव (जो अभी पाकिस्तान में है) के एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ था, जिसका अनुकूल प्रभाव उन पर पड़ा था। उनके पिता का नाम सरदार
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हमें बताओ कैसे भागे, आप रात की जेल से। आए हो किस रेल से। हमें पता है रात आपकी, बीती आपाधापी में। दबे पड़े थे कहीं बीच में, अंधियारे की कॉपी में। अश्व आपके कैसे छूटे? तम की कसी नकेल से। पूरब की खिड़की का पर्दा, रोज खोलकर आ जाते। किंतु शाम की रेल पकड़कर,
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वर्तमान में हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी है। उनका पूरा नाम नरेन्द्र दामोदरदास मोदी है। उनका जन्म 17 सितंबर 1950 को हुआ है। भारत के राष्‍ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें 26 मई 2014 को भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। वे स्वतंत्र भारत के 15वें प्रधानमंत्री हैं तथा इस पद पर आसीन
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हिमालय जैसे विराट व्यक्तित्व के धनी हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नरेन्द्र मोदी ऐसी शख्सियत का नाम है, जो कभी भी आलोचनाओं से घबराता नहीं है बल्कि अपनी आलोचनाओं का आत्ममूल्यांकन कर अपनी कमियों को सुधारने की कोशिश करता है। यही खूबी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दूसरे राजनीतिज्ञों से अलग बनाती है। अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
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भारत में प्रतिवर्ष 15 सितंबर को इंजीनियर डे मनाया जाता है। इस दिन को महान इंजीनियर एम. विश्वेश्वरैया को समर्पित किया गया है और उन्हीं की याद में इस दिन को इंजीनियर दिवस के तौर पर मनाया जाता है। सर एम. विश्वेश्वरैया एक बेहतरीन इंजीनियर थे और उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्यों जैसे नदियों के बांध,
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सवाल-क्या बच्चों को सुधारने के नाम पर उनकी पिटाई की जानी चाहिए? जवाब- कतई नहीं, यह तर्क ही गलत है। बच्चों को स्कूल में शिक्षा के साथ ही अनुशासन का पाठ पढ़ाने की जिम्मेदारी भी शिक्षकों की ही है। पिटाई, बच्चों को सुधारने का विकल्प नहीं है। काउंसलर्स की सलाह को अमल में लाने के
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प्रिय विद्यार्थियों, स्नेहिल शुभकामनाएं आप आज शिक्षक दिवस मना रहे हैं। दिवसों की भीड़ में एक और दिवस। कहने को मैं आपकी शिक्षिका हूं, किंतु सच तो यह है कि जाने-अनजाने न जाने कितनी बार मैंने आपसे शिक्षा ग्रहण की है। कभी किसी के तेजस्वी आत्मविश्वास ने मुझे चमत्कृत कर‍ दिया तो कभी किसी विलक्षण
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आज शिक्षा का अर्थ साक्षरता और सूचनात्मक जानकारियों से समृद्ध होना है और आज की शिक्षा का उद्देश्य किसी शासकीय, अशासकीय कार्यालय का वेतनभोगी अधिकारी-कर्मचारी बनना भर है। इस अर्थ में शिक्षा अपने वास्तविक स्वरूप और उद्देश्य से बहुत दूर है और तथाकथित शिक्षित उत्पन्न कर आधी-अधूरी क्षमताओं वाले बेरोजगारों की भीड़ जुटा रही है।
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