प्रत्‍येक कार्य को कर्तव्‍य पालन के भाव से करना ही सच्‍चा धर्म है

राशि


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ताओ बू चिन चीन के एक महान दार्शनिक संत थे। वह विद्वान तो थे ही, सादगीपूर्ण जीवन भी जीते थे। बड़ी संख्या में लोग उनके पास आते और संतुष्ट होकर लौटते थे। प्रत्येक व्यक्ति को उसकी प्रकृति के अनुकूल शिक्षा देना, तदनुसार उसे कर्मशील बनाना उनकी विशेषता थी। एक दिन उनके पास चुंग सिन नाम का एक व्यक्ति पहुंचा। उसने उनसे धर्म की शिक्षा देने की प्रार्थना की।

संत ताओ ने उस व्यक्ति को कुछ समय तक तो अपने पास रखा, फिर उसे दीन-दुखियों एवं जरूरतमंदों की सेवा में लगा दिया। चुंग सिन इस कार्य में निष्ठापूर्वक लगा रहा। वह वृद्धों व लाचारों की सेवा करता, उनका उपचार करवाता, उन्हें यथासमय औषधि देता। उसने इन कार्यों को करने में न दिन देखा, न रात। वह अपना आराम, सुख-चैन छोड़कर असहायों की मदद करने में लगा रहा। चुंग सिन को सेवा कार्य करते-करते काफी समय हो गया। एक दिन उसने संत ताओ बू चिन से आग्रह किया- ‘महात्मन! आपके पास रहते हुए मुझे लंबा समय बीत गया, किंतु आपने मुझे अब तक धर्म की शिक्षा नहीं दी।’

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संत ने मुस्कराते हुए कहा, ‘तुम्हारा तो जीवन ही धर्ममय हो गया है। फिर मैं तुम्हें इस विषय में और क्या शिक्षा देता? तुम्हें जो कार्य सौंपे गए, उनका पालन तुम पूरी निष्ठा से करते रहे हो, तुमने तो अपने को गौण ही कर दिया, यही सबसे बड़ा धर्म है। धर्म की शिक्षा केवल उपदेश से नहीं आती, बल्कि जीवन-व्यवहार से मिलती है। तुम इस शिक्षा में पारंगत हो, यह तुम्हारे व्यवहार एवं कार्य-निष्ठा से लगता है। अब तुम्हें और शिक्षा की जरूरत नहीं है। प्रत्येक कार्य को कर्तव्य पालन का भाव लेकर करना ही सच्चा धर्म है। धर्म पालन से आशय मंदिर-मस्जिद में पूजा या व्रत-उपवास अथवा किसी भी प्रकार के बाह्य आडंबर से नहीं है।

संकलन : बेला गर्ग

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