इसलिए खुद के बारे में हम जैसा सोचते हैं वैसे ही बन जाते हैं

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इसलिए खुद के बारे में हम जैसा सोचते हैं वैसे ही बन जाते हैं

श्री श्री आनन्दमूर्ति
जीवों में मनुष्य विशेष रूप से मन प्रधान जीव है। अर्थात वह मानसिक जीव है। वह जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है। उदाहरण के लिए भूत-प्रेत की हमारी धारणाएं भ्रांत हैं, उनका कोई अस्तित्व नहीं होता, किंतु उनका बार-बार चिंतन होने से मनुष्य का मन उनका रूप परिग्रह कर लेता है और मनुष्य उनकी अनुभूति करने लगता है। जागतिक क्षेत्र में मनुष्य की इच्छाएं सीमित या शांत वस्तुओं को लेकर होती हैं। अतः उसका मन भी शांत और सीमा रेखाओं से आबद्ध हो जाता है।

मनुष्य के मन की सीमा रेखा उसके मन में उत्पन्न भाव जड़ताओं (डॉग्मा) के द्वारा भी सीमांकित होती है। जब वह क्षुद्र वस्तुओं को अथवा क्षुद्रताओं को अपने मन का विषय बना लेता है तो वह अपने को सीमाओं में बांध लेता है। जब वह कहता है कि मैं अमुक जाति का हूं, मैं इतना बड़ा पंडित हूं, तो यह सब भाव उसके मन को सीमा रेखा में आबद्ध कर देते हैं। किंतु वही मनुष्य जब अपनी एषणा को अनंत की ओर उन्मुख कर देता है, तो वह भी अनंत बन जाता है। साधना में ध्यान का यही महत्व है। यही है उसकी सत्ता का चरम विस्तार, चरमोत्कर्ष।

आज के युग में मनुष्य पर इतना दबाव पड़ता है कि मनुष्य का छोटा सा मस्तिष्क सहन नहीं कर पाता है। उसे स्नायु संबंधी अथवा मानसिक रोग हो जाते हैं। उससे बचने का तरीका है, गुरुमंत्र का प्रयोग। जितने भी कर्म हम करें, सदैव यह भावना लेते रहें कि यह मेरा काम नहीं मेरे प्रभु का काम है और मैं उसके निर्देश के अनुसार करता जा रहा हूं। मैं उनका ही काम करने के लिए इस धरातल पर आया हूं। ऐसा सोचने से मानसिक तनाव नहीं होगा और मनुष्य जब तक जीवित रहेगा, सानंद रहेगा। मनुष्य यह भूल जाता है, इसलिए उसके सामने उलझनें आती हैं और तब वह घबरा जाता है।

यद्यपि साइंस अधिक तरक्की कर चुका है, फिर भी आज के मनुष्य में पहले के मनुष्य की अपेक्षा घबराहट अधिक होती है। डर का कारण यह है कि साइंस भौतिक क्षेत्र में आगे बढ़ गया है, किंतु जिस अनुपात में वह आगे बढ़ा है, उस अनुपात में मनुष्य के मन की और उसके स्नायुकोशों की पुष्टि नहीं हुई है। इसी कारण संतुलन का अभाव आ गया है। इस स्थिति से बचने का भी सीधा तरीका यही है कि मनुष्य सोचे, वह इस धरती पर उस परमपुरुष का ही काम करने के उद्देश्य से आया है। सोचे कि वह उनका ही काम कर रहा है।

घमंड भी मनुष्य के मन की बीमारी है, जिससे उसका पतन हो जाता है। यदि मनुष्य हमेशा परमपुरुष को लेकर ही व्यस्त रहेगा तो उसका प्रेम उनके प्रति बढ़ता रहेगा और परमपुरुष को भी मनुष्य पर विशेष ध्यान देना ही पड़ेगा। परमपुरुष तो पिता के समान हैं। वह जानते हैं कि उनकी संतान में कुछ बुराइयां अभी हैं, लेकिन वह अपनी संतान को सोलह आने ठीक करने की कोशिश करेंगे। अगर मां किसी कमी के कारण बच्चे को डांटती भी है तो पिता कहेगा, छोड़ो जी, क्यों डांट रही हो, देखो वह रो रहा है। अतः सदैव परमपुरुष का भाव लेने से उनसे प्रेम हो ही जाता है और उसके परिणामस्वरूप उनकी कृपा अवश्य ही मिलती है।

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