गुरु गोरखनाथ ने इस तरह किया बच्चे को जीवित, फेंक दी सोने की ईंट

राशि


Guru-Gorakhnath

सुरक्षित गोस्वामी

गुरु गोरक्षनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ थे, जिनको मछिंदरनाथ भी कहा जाता है। एक बार मत्स्येंद्रनाथ पूर्वोत्तर के एक राज्य में गए, वहां की महिलाएं बड़ी मायावी थीं। यहां के एक राज्य की रानी मृणावती ने मत्स्येंद्रनाथ को अपने रूप जाल में फंसा लिया। रानी मृणावती के कोई संतान नहीं थी और उनके पति की हाल ही में मौत हुई थी। गुरु एक साल तक रानी के रूप जाल में फंसे रहे, तभी उनके एक पुत्र हुआ। रानी के महल में पुरुषों का प्रवेश वर्जित था।

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गोरखनाथ को पता चलने पर वो गुरु को रूप जाल से बाहर निकालने के लिए चल दिए। रानी के साथ रहकर मत्स्येंद्रनाथ स्वयं की साधना को भूल गए थे। चूंकि महल में पुरुषों का प्रवेश वर्जित था, इसलिए गोरख, स्त्री का वेश बनाकर महल में पहुंच गए। वहां जाकर उन्होंने मृदंग पर बजाना शुरू किया ‘जाग मछिंदर गोरख आया, चेत मछिंदर गोरख आया, चल मछिंदर गोरख आया’। इतना सुनते ही मत्स्येंद्रनाथ अपने शिष्य गोरखनाथ को पहचान गए। वहीं मत्स्येंद्रनाथ के बेटे ने शौच कर दिया और मत्स्येंद्रनाथ उसको साफ करने लगे। गोरखनाथ ने कहा, गुरुजी मैं साफ करके लाता हूं।

आने पर गोरखनाथ ने कहा बच्चा गंदा होने के कारण पहले मैंने धोबी की तरह उसको पत्थर पर कई बार सिर पटका फिर धोकर सूखाने के लिए टांग दिया है। सुनते ही मत्स्येंद्रनाथ बेहोश हो गए। अब गोरखनाथ ने गुरु को समझाना शुरू किया कि यह सब मोह-माया है। गोरखनाथ ने कहा कि यदि आप मेरे साथ चलते हैं, तो बालक जिंदा हो जाएगा। गुरु ने गोरखनाथ की बात मान ली। गोरखनाथ ने मरे बच्चे पर मंत्र पढ़ा, बच्चा जिंदा हो गया। गोरखनाथ के साथ चलते समय मत्स्येन्द्रनाथ ने सोने की ईंटें रख लीं। रास्ते में रात होने लगी।

गोरखनाथ रात को जंगल में रुकने के लिए कहते, लेकिन मत्स्येंद्रनाथ गांव में पास रुकना चाहते थे। गुरु को डाकू से लूटने का डर था। थोड़ी देर बाद मत्स्येंद्रनाथ शौच को गए तो पोटली छोड़ गए, तब गोरखनाथ ने पोटली खोलकर देखी, तो सोने की ईंटें थी, गोरखनाथ ने पोटली कुएं में फेंक दी।

मत्स्येंद्रनाथ जब लौटें, तो गोरखनाथ ने कहा मैंने सोने की पोटली तो फेंक दी है, अब आपकी तमाम चिंताएं दूर हो गईं। तभी मत्स्येंद्रनाथ का माया भ्रम टूट गया। कामवासना का जाल किसी भी पहुंचे हुए व्यक्ति को उसको उसकी ऊंची अवस्था से नीचे ला सकता है, इसलिए बिखरी हुई कामवासना को अपना शत्रु समझना चाहिए।

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