जानें, भारतीय नौसेना का इतिहास और ताकत

शिक्षा
​यूं भारतीय नौसेना ने तबाह किया था कराची पोर्ट, पढ़ें ऑपरेशन ट्राइडेंट की पूरी कहानी

सांकेतिक तस्वीर
हाइलाइट्स

  • भारतीय नौसेना का इतिहास 1612 से शुरू होता है
  • रॉयल इंडियन मरीन में कमीशन होने वाले पहले भारतीय सब लेफ्टिनेंट डी.एन.मुखर्जी थे
  • 22 अप्रैल, 1958 को वाइस एडमिरल आर.डी.कटारी भारतीय नौसेना के पहले प्रमुख बने

भारतीय नौसेना का इतिहास 1612 से मिलता है। 5 सितंबर, 1612 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने समुद्री डकैतों और अपने प्रतिद्वंद्वियों से मुकाबले के लिए एक छोटे से समुद्री रक्षक बेड़े का गठन किया। इसे ईस्ट इंडिया कंपनी के मरीन के नाम से जाना गया। यह बेड़ा सूरत (गुजरात) के करीब स्वाली में स्थित था। इसके जिम्मे कैम्बे की खाड़ी और तापती एवं नर्मदा नदी में ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार की रक्षा करना था। इस फोर्स के अधिकारियों और जवानों ने अरब सागर, फारस की खाड़ी और भारतीय तटों के सर्वे में अहम भूमिका निभाई।

बॉम्बे मरीन
1662 को बॉम्बे ब्रिटिश के हाथ में चला गया लेकिन औपचारिक रूप से ब्रिटिश शासन ने इसे अपने कब्जे में 8 फरवरी 1665 को लिया। 27 सितंबर, 1668 को ब्रिटिश सरकार ने इस द्वीप को ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया। इसके बाद बाम्बे से होने वाले व्यापार की रक्षा की जिम्मेदारी भी इस फोर्स को सौंप दी गई। 1686 से कंपनी के व्यापार का केंद्र मुख्य रूप से बॉम्बे बन गया। इसके बाद इस फोर्स का नाम भी बदलकर बॉम्बे मरीन हो गया। इस फोर्स ने न सिर्फ पुर्तगालियों, डचों और फ्रेंच से लड़ने में अहम भूमिका निभाई बल्कि अन्य देशों के समुद्री डकैतों से भी निपटने में अहम भूमिका निभाई। बॉम्बे मरीन ने 1824 में बर्मा युद्ध में भी हिस्सा लिया था।

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बदलता रहा नाम
1830 में बॉम्बे मरीन का नाम बदलकर हर मजेस्टीज इंडियन नेवी हो गया। 1840 में चीन के साथ युद्ध में इस सैन्य बल की क्षमता देखने को मिली थी। अगले कुछ दशकों में ताकत बढ़ने के साथ इसका कई बार नाम भी बदला। 1863 से 1877 तक इसका नाम एक बार फिर बॉम्बे मरीन कर दिया गया, उसके बाद हर मजेस्टीज इंडियन मरीन कर दिया गया।

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    आज 4 दिसंबर को नौसेना दिवस मनाया जाता है। बहुत से लोग यह अनुमान लगाएंगे कि शायद इसी दिन भारतीय नौसेना अस्तित्व में आई थी लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल नौसेना दिवस भारतीय नौसेना के पराक्रम का प्रतीक है। इसी तारीख को यानी 4 दिसंबर, 1971 को भारतीय नौसेना ने कराची पोर्ट को तबाह कर दिया था जो पाकिस्तान के लिए रीढ़ की हड्डी के समान था। आइए आज हम भारतीय नौसेना के पराक्रम की पूरी कहानी आपको बताते हैं…

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    1971 का साल पाकिस्तान के इतिहास में शायद सबसे दुर्भाग्यपूर्ण साल है। यह वही साल था जब पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए और बांग्लादेश का जन्म हुआ। इसी साल पाकिस्तान के करीब 90 हजार सैनिकों को भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा। इतनी बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण अपने आप में इतिहास है।

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    वैसे तो 1971 के युद्ध में भारतीय सेना के तीनों अंगों यानी थल सेना, वायु सेना और नौसेना ने जबर्दस्त काम किए। लेकिन भारतीय नौसेना का काम काफी उल्लेखनीय था। भारतीय वायु सेना और भारतीय थल सेना ने दुश्मन के सैनिकों को रोकने का काम किया। दूसरी तरफ भारतीय नौसेना ने पाकिस्तान के पूर्वी और पश्चिमी बंदरगाह वाले रास्तों को बंद कर दिया। भारतीय नौसेना ने एक ही रात में पाकिस्तान की तीन जलपोतों को तबाह कर दिया था। इससे पाकिस्तान को काफी नुकसान उठाना पड़ा।

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    भारतीय नौसेना के इस मिशन का नाम ऑपरेशन ट्राइडेंट था। इस मिशन के तहत भारतीय नौसेना के मिसाइल युक्त पोतों ने कराची पोर्ट पर हमला किया। कराची पोर्ट की अहमियत को देखकर इसे निशाने पर लिया गया था। कराची पोर्ट एक तरफ पाकिस्तानी नौसेना का मुख्यालय था और दूसरी ओर पाकिस्तान का तेल भंडार भी वहां था।

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    दुनिया के इस सबसे साहसिक मिशन का नेतृत्व एडमिरल सरदारीलाल मथरादास नंदा कर रहे थे। मिशन की योजना नौसेना के बेड़ा संचालन अधिकारी गुलाब मोहनलाल हीरानंदानी ने बनाई थी।

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    भारतीय नौसेना ने कई बाधाओं का सामना करते हुए इस मिशन को अंजाम दिया था। एक तो भारतीय नौसेना के रेडार की रेंज बहुत सीमित थी, दूसरी ओर उसकी ईंधन क्षमता भी बहुत कम थी। लेकिन भारतीय नौसेना साहस और उत्कृष्टता का प्रदर्शन करते हुए मिसाइल फिट पोतों को कराची पोर्ट के बिल्कुल करीब ले गई ताकि पूरी क्षमता से हमला कर सके।

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    भारत के लिए सबसे बड़ी कामयाबी और पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी तबाही पाकिस्तानी नौसेना की पनडुब्बी पीएनएस गाजी का तबाह होना था। पीएनएस गाजी को पाकिस्तान ने अमेरिका से लीज पर लिया था। उस समय गाजी का जवाब दक्षिण एशिया में किसी देश के पास नहीं था। उसके अलावा वह इकलौती पनडुब्बी थी जिसके अंदर बंगाल की खाड़ी तक पहुंचने के लिए 11000 समुद्री मील दूरी तय करनी की क्षमता थी। वह कहावत है न कि शिकारी खुद शिकार हो गया, कुछ ऐसा ही गाजी के साथ हुआ। पाकिस्तान की ओर से गाजी को भेजा गया था कि भारतीय नौसेना के विमानवाहक जहाज आईएनएस विकांत को खोजकर तबाह करे। लेकिन इस चक्कर में गाजी खुद तबाह हो गई।

उस समय मरीन के दो डिविजन थे। पूर्वी डिविजन कलकत्ता में था जिसका काम बंगाल की खाड़ी पर नजर रखना। दूसरे डिविजन का नाम पश्चिमी डिविजन था जिसका मुख्यालय बॉम्बे था। इसके जिम्मे अरब सागर की देखरेख का जिम्मा था।

इसकी सेवाओं को देखते हुए 1892 में इसे रॉयल इंडियन मरीन का खिताब मिला। उस समय उसके बेड़े में 50 पोत थे।

1934 में इसका नाम बदलकर रॉयल इंडियन नेवी कर दिया गया। 1935 में नेवी के उल्लेखनीय कामों के लिए किंग्स कलर भेंट किया गया।

विश्व युद्धों में भूमिका
पहले विश्व युद्ध के दौरान मरीन ने अहम भूमिका निभाई। इसका इस्तेमाल गश्त के अलावा इराक, मिस्र और पूर्वी अफ्रीका में सैनिकों और साजोसामान के परिवहन के लिए किया गया।

दूसरे विश्वयुद्ध के समय रॉयल इंडियन नेवी में आठ युद्धपोत थे। युद्ध के अंत तक इसके बेड़े में 117 युद्धक पोत और 30,000 जवान थे।

नौसेना में पहले भारतीय
रॉयल इंडियन मरीन में 1928 में सब लेफ्टिनेंट डी.एन.मुखर्जी को कमीशन किया गया था। इंजिनियर ऑफिसर के पद पर नियुक्त हुए मुखर्जी पहले भारतीय थे जिनको रॉयल इंडियन मरीन में कमीशन मिला था।

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आजादी के बाद
जब भारत आजाद हुआ तो उस समय रॉयल इंडियन नेवी के बेड़े में 32 पोत थे जो पुराने हो चुके थे। वे पोत सिर्फ तटीय गश्त के मतलब के ही थे। उस समय नेवी में 11,000 अधिकारी और जवान थे। आजादी के बाद नेवी के पहले कमांडर इन चीफ रीयर एडमिरल आईटीएस हॉल, सीआईई थे।

26 जनवरी, 1950 को भारत के गणराज्य बनने के साथ ही रॉयल उपसर्ग को हटा दिया गया। इंडियन नेवी यानी भारतीय नौसेना के पहले कमांडर इन चीफ एडमिरल सर एडवर्ड पैरी, केसीबी बने जिन्होंने 1951 में एडमिरल सर मार्क पिजी, केबीई, सीबी, डीएसओ को प्रभार सौंप दिया था।

एडमिरल पिजी 1955 में पहले चीफ ऑफ नेवल स्टाफ यानी नौसेना प्रमुख बने। 22 अप्रैल, 1958 को वाइस एडमिरल आर.डी. कटारी ने नौसेना के प्रथम भारतीय चीफ के रूप में पद ग्रहण किया।

भारतीय नौसेना की ताकत
भारतीय नौसेना के पास एक विमानवाहक समेत करीब 300 पोत, पनडुब्बियां आदि हैं। इसके बेड़े में 14 फ्रिगेट्स, 11 विनाशक पोत, 22 कॉर्वेट्स, 16 पनडुब्बियां, 139 गश्ती पोत और चार बारूदी सुरंगों का पता लगाने और उनको तबाह करने वाले पोत हैं।

आपको बता दें कि हाल ही में नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा से जब चीन के अपनी नौसैनिक क्षमता तेजी से बढ़ाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘2050 तक, हमारे पास भी 200 जहाज, 500 विमान और एक विश्वस्तरीय नौसेना होगी।’ एडमिरल ने आगे बताया कि सरकार ने नौसेना में 56 नए जंगी जहाजों और 6 पनडुब्बियों को शामिल करने की योजना को मंजूरी दे दी है। देश का पहला स्वदेश निर्मित विमानवाहक पोत विक्रांत अपने निर्माण के अंतिम चरण में पहुंच गया है और इसका समुद्री परीक्षण 2020 में होगा।

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अहम ऑपरेशंस

ऑपरेशन राहत: भारतीय सशस्त्र बलों ने 2015 में ऑपरेशन राहत को अंजाम दिया था। इस ऑपरेशन में युद्धग्रस्त यमन से लोगों को सुरक्षित निकाला गया। आईएनएस सुमित्रा को लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए भेजा गया था और आईएनएस मुंबई एवं आईएनएस तरकश को उसकी सुरक्षा के लिए भेजा गया था। इस मिशन में न सिर्फ भारतीय नागरिकों बल्कि विदेशी नागरिकों को भी यमन से सुरक्षित निकाला गया। भारतीय नौसेना ने करीब 3000 से ज्यादा भारतीयों को सुरक्षित निकाला।

ऑपरेशन सुकून: साल 2006 में इजरायल और लेबनान के बीच युद्ध हुआ था। बड़ी संख्या में भारत के अलावा श्रीलंका और नेपाल के लोग लेबनान युद्ध में फंस गए थे। उनलोगों को सुरक्षित निकालने की जिम्मेदारी को भारतीय नौसेना ने निभाया था।

ऑपरेशन तलवार: 1999 में करगिल युद्ध के दौरान ऑपरेशन तलवार को अंजाम दिया गया था। भारतीय नौसेना ने कराची पोर्ट के करीब पाकिस्तानी पोतों और नौकाओं के लिए अवरोध पैदा कर दिया। इससे पाकिस्तान में तेल और ईंधन की आपूर्ति प्रभावित हुई। बाद में पाकिस्तान ने भारत से अवरोध हटाने का आग्रह किया।

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ऑपरेशन कैक्टस: ऑपरेशन कैक्टस में आईएनएस गोदावरी और आईएनएस बेतवा शामिल थे 1988 में चलाए गए इस ऑपरेशन का मकसद मालदीव संकट को सुलझाना था।

ऑपरेशन ट्राइडेंट: ऑपरेशन ट्राइडेंट 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ अंजाम दिया गया था। पाकिस्तान के कराची पोर्ट पर भारतीय नौसेना ने हमला करके उसके कई पोतों को तबाह कर दिया था।

ऑपरेशन विजय: ऑपरेशन विजय 1961 में गोवा को पुर्तगालियों से चंगुल से आजाद कराने के लिए चलाया गया था। उसमें पहली बार नौसेना का इस्तेमाल किया गया था।

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