इतिहास रचने वाले 20 दिव्यांग, पढ़ें प्रेरक कहानी

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इतिहास रचने वाले 20 दिव्यांग, पढ़ें प्रेरक कहानी

Web Title:differently-abled people proved nothing is impossible

(Hindi News from Navbharat Times , TIL Network)

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इतिहास रचने वाले 20 दिव्यांग, पढ़ें प्रेरक कहानी

कुछ करने के लिए इंसान की शारीरिक क्षमता की नहीं बल्कि इंसान के अंदर मजबूत इरादे की जरूरत होती है। आज हम विश्व दिव्यांग दिवस के अवसर पर आपको दुनिया को ऐसे लोगों की कहानी बताने जा रहे हैं जो मजबूत इरादे की मिसाल हैं। उनमें से कुछ किसी दुर्घटना में तो कोई किसी और वजह से दिव्यांग हुए। लेकिन उनलोगों ने हिम्मत नहीं हारी और कुछ हटकर ऐसा किया कि इतिहास में नाम दर्ज हो गया।

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​मेजर देवेंद्र पाल

​मेजर देवेंद्र पाल

भारत के पहले ब्लेड रनर मेजर देवेंद्र पाल सिंह लोगों के लिए प्रेरणा हैं। करगिल युद्ध के दौरान अपना दायां पैर गंवाने वाले पाल ने अपनी दिव्यांगता को ही अपनी ताकत बनाई। अपने कभी हार नहीं मानने वाले जज्बे के कारण वह भारत के पहले ब्लेड रनर बन गए। उन्होंने 9 मैराथन में हिस्सा लिया। तीन हाफ मैराथन में हिस्सा लेने के बाद सेना ने उनकी मदद की और उनको आयरलैंड में बना कृत्रिम पैर उपलब्ध कराया।

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​शरत गायकवाड

​शरत गायकवाड

एक हाथ से मजबूर शरत ने 9 साल की उम्र से ही तैरने का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया। उन्होंने पैरा इंचियोन एशियन गेम्स 2014 में 6 पदक जीतकर इतिहास बनाया। इसके साथ ही उन्होंने एशियन गेम्स में उड़नपरी पी.टी.उषा के रेकॉर्ड को तोड़ दिया। इतना ही नहीं उन्होंने अंतरराष्ट्रीय तैराकी प्रतियोगिता में 30 से ज्यादा और राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 40 से ज्यादा पदक हासिल करने का रेकॉर्ड उनके नाम है।

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​कार्तिक साहनी

​कार्तिक साहनी

जब 18 साल के कार्तिक साहनी ने 12वीं में 96 फीसदी नंबर हासिल किया तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह इतना नंबर लाने वाले पहले दृष्टिबाधित छात्र बन गए। दृष्टिबाधित होने के कारण लगातार तीन सालों तक उनको आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कोशिश करते रहे। अंत में उनकी कोशिश रंग लाई और कैलिफॉर्निया स्थित स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी से 5 साल के इंजिनियरिंग प्रोग्राम के लिए स्कॉलरशिप मिल गई। वह भारत आकर दृष्टिबाधित लोगों के लिए कुछ करने का इरादा रखते हैं।

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​गिरीश शर्मा

​गिरीश शर्मा

गिरीश शर्मा एक चैंपियन बैडमिंटन खिलाड़ी हैं। जब वह 2 ही साल के थे तो एक ट्रेन दुर्घटना में अपना पैर खो दिया। उन्होंने जर्मनी, इस्राइल और थाइलैंड में बैडमिंटन चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने पैरालिंपिक एशिया कैप में एक गोल्ड मेडल भी जीता।

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​पद्म श्री डॉ.मलाथी कृष्णामूर्ति हॉला

​पद्म श्री डॉ.मलाथी कृष्णामूर्ति हॉला

एक साल की उम्र में वह पोलियो का शिकार हो गई थीं। काफी इलाज हुआ लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। हल्का सा फर्क यह आया था कि शरीर के ऊपरी हिस्से में थोड़ी ताकत आ गई थी बाकी शरीर के निचले हिस्से ने काम करना बंद कर दिया था। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और एक असहाय बच्चे से पदम श्री विजेता बनने तक का उनका सफर काफी प्रेरणादायक है। 300 से अधिक स्वर्ण पदक जीतने पर उन्हें पदमश्री व अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया। उन्होंने दक्षिण कोरिया, बार्सिलोना, एथेंस और बीजिंग में आयोजित पैरालिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। बीजिंग, बैंकाक, दक्षिण कोरिया और कुआलालंपुर में आयोजित एशियाई खेलों में; डेनमार्क और ऑस्ट्रेलिया में आयोजित विश्व मास्टर्स, ऑस्ट्रेलिया में राष्ट्रमंडल खेलों और बेल्जियम, कुआलालंपुर और इंग्लैंड में ओपन चैंपियनशिप में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया।

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​सुभरीत कौर घुम्मन

​सुभरीत कौर घुम्मन

सुभरीत कौर एक पैर की डांसर के रूप में लोकप्रिय हैं। एक दुर्घटना में उनको अपना एक पैर गंवाना पड़ा। पंजाब के संगरूर जिले की रहने वाली सुभरीत ने दुर्घटना के बाद हौसला नहीं हारा। एक डांस रिऐलिटी शो में चुने जाने के बाद वह चर्चा में आईं।

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​नवीन गुलिया

​नवीन गुलिया

दिल्ली के रहने वाले नवीन गुलिया सेना में कमांडर के तौर पर शामिल होना चाहते थे। लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। एक स्पोर्ट्स दुर्घटना में गुलिया लकवाग्रस्त हो गए और उनकी बाईं स्पाइन बुरी तरह घायल हो गई। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और कुछ ऐसा किया कि लिम्का बुक ऑफ रेकॉर्ड्स में उनका नाम दर्ज हो गया। वह पहले व्यक्ति बन गए जिन्होंने दिल्ली से मार्सेमिक ला का सफर किया। मार्सेमिकला 8,632 फीट की ऊंचाई पर स्थित दुनिया का सबसे ऊंचा दर्रा है। उन्होंने बगैर रुके हुए 55 घंटे में इस सफर को पूरा किया।

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​अरुणिमा सिन्ह

​अरुणिमा सिन्ह

अरुणिमा एक हादसे में बायां पैर खो चुकी हैं और दाएं पैर में लोहे की रॉड पड़ी है। उनके पैर खोने की कहानी भी बेहद दर्दनाक है। राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल प्लेयर अरुणिमा को लखनऊ से दिल्ली जाते वक्त कुछ लुटेरों ने चेन छीनने की कोशिश में ट्रेन से नीचे फेंक दिया था, इस हादसे के बाद वह उन्होंने अपने पैर खो दिए लेकिन हिम्मत नहीं हारी। वह माउंट एवरेस्ट चढ़ने वाली पहली दिव्यांग महिला हैं।

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​एच.बोनीफेस प्रभु

​एच.बोनीफेस प्रभु

चार साल की उम्र में प्रभु को लकवा मार दिया था। उन्होंने इसे अपने जीवन के लक्ष्यों पर हावी नहीं होने दिया और रेग्युलर स्कूल में पढ़ाई जारी रखी। कठिन परिश्रम और समर्पण की बदौलत वह वह दुनिया के मशहूर वीलचेयर टेनिस प्लेयर बने। 1998 वर्ल्ड चैंपियनशिप में उन्होंने पदक जीता। 2014 में भारत सरकार ने उनको पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया।

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