मोहल्ला अस्सी

फ़िल्म रिव्यू

‘जो मजा बनारस में, वह पेरिस में, न फारस में।’ बनारस की इसी अलहदा संस्कृति और बाजारवाद के जद में इसके बदलते स्वरूप की दास्तान है निर्देशक चंद्र प्रकाश द्विवेदी की फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी‘। फिल्म बनारस के बहाने बाजारवाद की चपेट में आकर धराशायी होते सामाजिक और नैतिक मूल्य, धर्म और आस्था के नाम पर किए जाने वाले आडंबर और राजनीतिक पतन पर गहरा विमर्श खड़ा करती है। लेकिन इसी वजह से फिल्म काफी गंभीर भी हो जाती है, जिसके चलते मनोरंजन की तलाश करने वाले दर्शक इससे दूर हो सकते हैं। जबकि, धर्म, राजनीति, संस्कृति आदि में रुचि रखने वालों को यह पसंद आएगी।

कहानी: मशहूर लेखक काशीनाथ सिंह की किताब ‘काशी का अस्सी’ पर आधारित इस फिल्म में धर्मनाथ पांडेय (सनी देओल) सिद्धांतवादी पुरोहित और संस्कृत अध्यापक हैं, जो काशी में विधर्मियों यानी विदेशी सैलानियों की घुसपैठ के सख्त खिलाफ हैं। उनके डर से ब्राह्मणों के अस्सी मोहल्ले में कोई चाहकर भी विदेशी किराएदार नहीं रख पाता। वह उनमें से हैं जिनके लिए गंगा नदी नहीं, मैया है, जिसे वह विदेशियों का स्वीमिंग पूल नहीं बनने देंगे। इसी वजह से टूरिस्ट गाइड गिन्नी (रवि किशन) से भी वह खूब चिढ़ते हैं। लेकिन बदलते वक्त के साथ वह दौर भी आता है, जब धर्मनाथ पांडेय को अपने ये सिद्धांत, आदर्श और मूल्य खोखले लगने लगते हैं और वह खुद समझौता करने को तैयार हो जाते हैं। फिल्म में एक और बेहद अहम किरदार है पप्पू की चाय की दुकान। इस दुकान की अहमियत का अंदाजा इस डायलॉग से लगाया जा सकता है, ‘हिंदुस्तान में संसद दो जगह चलती है, एक दिल्ली में, दूसरी पप्पू की दुकान में।’ अस्सी के बुद्धिजीवियों की सारी राजनीतिक चर्चा इसी दुकान पर होती है।

slide

Mohalla Assi: मोहल्ला अस्सी ऑफिशल ट्रेलर

Loading

रिव्यू: चंद्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में बनी यह फिल्म विवादों की आंच और सेंसर के कैंची झेलकर 6 साल बाद सिनेमाघरों तक पहुंच पाई है, इसका असर भी फिल्म पर पड़ा है। कई जगह कहानी के सिरे छूटते हुए लगते हैं। मसलन, साल 1988 और 1991 में बाबरी मस्जिद मामले को बिल्डअप करने के बाद सीधे 1998 में पहुंचना खटकता है। अभिनय के मामले में सनी देओल भावुक सीन्स में जमे हैं जबकि, संस्कृत के भारी डायलॉग बोलते वक्त उनकी मुश्किल नजर आती है। धर्मनाथ पांडेय की पत्नी के रोल में सांक्षी तंवर और गिन्नी की भूमिका में रवि किशन ने दमदार अभिनय किया है। सौरभ शुक्ला, सीमा आजमी सहित बाकी सहयोगी कलाकारों का काम भी बढ़िया है। अमोद भट्ट का संगीत कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ता, इसका कोई गाना रेडियो मिर्ची के म्यूजिक चार्ट में भी शामिल नहीं है।

क्यों देखें: धर्म, राजनीति आदि में रुचि रखने वाले देख सकते हैं।

Products You May Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *