बिहार में चचा बनाम भतीजा

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बिहार में आखिरकार एनडीए के दलों के बीच गठबंधन हो गया. इस समझौते में सबको खुश करने की कोशिश जरूर की गई है खासकर जेडीयू को. लगता है कि बीजेपी आलाकमान फिलहाल नीतीश कुमार को नाराज नहीं करना चाहती है. यही वजह है कि बीजेपी ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी जीती सीटें भी जेडीयू के लिए छोड़ दी हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में महज दो सीटें जीतने वाली जेडीयू को बीजेपी ने 16 सीटें दी हैं और 22 सीटें जीतने वाली बीजेपी खुद 17 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. पांच सीटें रामविलास पासवान के खाते में गई हैं, पिछली बार से एक सीट कम. मगर सबसे नुकसान में रहे उपेन्द्र कुशवाहा जिन्हें केवल दों सीटें मिली हैं जबकि कुशवाहा के तीन सांसद हैं. हांलाकि उनमें से एक बागी हो चुके हैं, इसलिए बीजेपी ने कुशवाहा को दो सीटें पकड़ा दी हैं.

वैसे कागज पर देखा जाए तो यह गठबंधन काफी मजबूत दिखता है एक तो इनके पास सत्ता है, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रूप में इनके पास भारतीय राजनीति के दो सबसे दमदार चेहरे भी मौजूद हैं. अमित शाह और प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार भी हैं. इसके अलावा गठबंधन की वजह से जातियों का समूह भी मौजूद है. दूसरी तरफ आरजेडी, मांझी और कांग्रेस गठबंधन फिलहाल कागज पर उतना मजबूत नहीं दिख रहा है. बगैर लालू यादव के आरजेडी गठबंधन कितने वोट लेगा और कितनी सीटें जीतेगा, यह बिहार में सबसे अधिक चर्चा का विषय है.

दूसरी ओर बिहार की जमीनी हकीकत कुछ और है. बिहार में आरक्षण सबसे बड़ा मुद्दा बनने वाला है. सवर्ण और दलित दोनों सरकार से नाराज हैं. उनकी अपनी अपनी वजह हैं. लोगों में यह भ्रम घर कर गया है कि सरकार आरक्षण खत्म करने वाली थी. इसका सबसे बड़ा खामियाजा एनडीए को रिजर्व सीटों पर झेलना पड़ेगा. यानी सबसे अधिक नुकसान रामविलास पासवान जैसे लोगों को होने वाला है जिनकी जीत में सवर्ण जातियों का काफी अहम रोल होता है. मतलब साफ है यदि सवर्ण दलित उम्मीदवार के लिए और दलित सवर्ण उम्मीदवार के लिए वोट करने नहीं निकलते हैं तो बिहार की राजनैतिक तस्वीर बदल सकती है.

बिहार में शराबबंदी को लेकर जहां दुनिया भर में नीतीश कुमार की सराहना हुई वहीं हुआ यह कि हर गांव में एक शराब माफिया पैदा हो गया, जिसकी पुलिस से सांठगांठ होती है. पुलिस का तीस फीसदी का हिस्सा बंधा हुआ है, ऐसा वहां के लोग बताते हैं. इसकी वजह से हर एक गांव में तनाव की स्थिति बनी हुई है. दूसरी तरफ आरजेडी गठबंधन के पक्ष में दो जातियां पूरी मजबूती से खड़ी हैं, ये हैं यादव और मुसलमान. इनको मिला दें तो 30 से ऊपर का आंकड़ा बैठता है. फिर जीतनराम मांझी के रूप में दलित वोटों का एक हिस्सा और कांग्रेस के पांच फीसदी वोट भी उनके पास हैं.

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इस तरह से जमीन पर आरजेडी गठबंधन किसी भी तौर पर कमजोर नहीं है केवल दिक्कत है कि उनके पास लालू यादव जैसे नेता नहीं हैं जो जनता की नब्ज जानता हो और जिसे बिहार की हर एक सीट और वहां कौन जीतेगा या फिर फिर जीतने का काम्बिनेशन क्या होगा, जैसी चीजें पता हों. तेजस्वी यादव में भविष्य के नेता के सारे गुण तो हैं मगर वे फिलहाल अपने घर के झगड़े में फंसे हुए हैं. कुल मिलाकर बिहार का लोकसभा चुनाव काफी दिलचस्प होने वाला है क्योंकि आजकल पलटू बाबू के नाम से पुकारे जाने वाले सुशासन बाबू की पूरी राजनैतिक हैसियत दांव पर लगी हुई है जिसे एक अदना सा भतीजा अच्छी टक्कर देता दिख रहा है.

मनोरंजन भारती NDTV इंडिया में ‘सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर – पॉलिटिकल न्यूज़’ हैं…
 
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