दशहरे के दिन करें यह उपाय, श्रीराम की कृपा से आएगी जीवन में सुख-शांति

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विकेश कुमार बडोला
दशहरा त्योहार भारतीय जीवन को सदियों से प्रेरित, आह्लादित और हर्षित-उल्लसित करता रहा है। त्रेतायुग में श्रीराम के जीवन से प्रेरणा पाकर मनाया जानेवाला यह पर्व आज तक सत्यनिष्ठ और सज्जन मनुष्यों के मनोभावों को सींच रहा है। आधुनिक जीवन की भागदौड़, शहरों की चकाचौंध और अत्याधुनिक मशीनों पर आधारित आज का मनुष्य जीवन दशहरा जैसे त्योहार के महात्म्य और आनंद से परिचित नहीं हो सकता। इस त्योहार का वास्तविक परिचय पाने और त्योहार के उद्देश्य के प्रति कर्म-कर्तव्य निभाते हुए इसका पूर्णानंद लेने के लिए रामायण के मर्म को समझना होगा।

आम तौर पर लोग रामायण और रामलीला को मात्र अपनी एकरस दिनचर्या में एक लघु परिवर्तन के रूप में ही देखते आए हैं। वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और उनसे प्रेरित उनके भाइयों, संबंधियों, मित्रों और उस कालखंड में श्री राम से विभिन्न नैतिक, आध्यात्मिक और जीवन संबंधी विषयों पर गहन विचार-विमर्श कर चुके ॠषियों-मुनियों से कोई सीख प्राप्त नहीं कर पाए हैं।

दशहरा बुराई पर अच्छाई तथा अधर्म पर धर्म का विजय का त्योहार मात्र रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतलों पर आग लगाने से नहीं बनेगा, बल्कि जनसामान्य से लेकर समाज के विशिष्ट लोगों को अपना आचरण, व्यवहार और जीवन श्रीराम की ही तरह बनाना होगा। जिन श्रीराम ने अपने पिता के वचन निर्वाह हेतु एक राजा होकर भी अपना जीवन वन में व्यतीत किया, क्या आज कोई धनी या साधन संपन्न व्यक्ति ऐसा कर सकने की स्थिति में है?

माना, आज के राजा-महाराजाओं को किसी मर्यादा के पालन हेतु वन गमन की आवश्यकता नहीं है, परंतु वे प्रजा के दुख-सुख को समझने और उस पर अपेक्षित प्रतिक्रिया के लिए श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में अपना तो सकते ही हैं। प्रतिवर्ष मनाया जानेवाला दशहरा त्योहार मनुष्य को यही चेतना प्रदान करने का एक ॠतुचालित प्रयास है। हमें अपने जीवन में रामायण, रामलीला के पात्रों और प्रतीकों जैसा अभिनय ही नहीं करना। रामलीला के वास्तविक मर्म को समझने की चेष्टा भी हमें करनी चाहिए।

श्रीराम ने पिता की आज्ञा से वनवास भोगकर न केवल रघुकुल की कीर्ति बढ़ाई अपितु पूरे समाज के सम्मुख जीवन संबंधी विभिन्न आदर्श प्रस्तुत किए। संयम, सदाचार, विनम्रता, वचन-पालन और मैत्री के लिए श्रीराम ने अपने जीवनकाल में जो कुछ किया, वह सदियों से विरुदावली के रूप में गाया जा रहा है, तो यह बहुत बड़ी बात है।

काश श्रीराम के जीवन को विरुदावली के रूप में प्रस्तुत करते आए वाल्मीकि, तुलसीदास जैसी महान विभूतियों की तरह ही आम जन की अंतर्दृष्टि भी विकसित हो तो मनुष्य जीवन कितना महान बन जाए! इस काल में मनुष्य जीवन में होने-रहने का सौभाग्य पाए मनुष्यों के लिए श्रीराम एक श्रेष्ठ आदर्श हैं, जिनके जीवन आदर्शों का अनुसरण करने की इच्छा रखनेभर से ही कल्याणकारी संकेत दिखने शुरू हो जाते हैं। रामराज्य की अभिलाषा को साकार करने के लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं को आगे लाना होगा। यह तब होगा जब हम वैर, कलुष, ईर्ष्या-द्वेश, स्वार्थ, अहंकार मुक्त होकर जीवन की राह पर चलेंगे। स्वयं श्रीराम प्रभु ने भी तो यही किया और त्रिलोक में प्रशंसनीय बन गए।

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