सच पता करने का खौफनाक तरीका, हिल जाएंगे आप

शिक्षा

​सच पता करने का खौफनाक तरीका, हिल जाएंगे आप

Web Title:licking hot metal as a lie detector test bishaa a terrible rituals

(Hindi News from Navbharat Times , TIL Network)

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​सच पता करने का खौफनाक तरीका, हिल जाएंगे आप

आज आपको हम सच पता करने की एक खौफनाक कुप्रथा के बारे में बताने जा रहे हैं जिसको बिशा के नाम से जाना जाता है। यह प्रथा बदू नाम के एक खानाबदोश समुदाय में पाई जाती है। यह बदू ट्राइब जुदेआ, नगेव और सिनाई प्रायद्वीप में पाई जाती है। ज्यादातर बदू इस्लाम धर्म के अनुयायी होते हैं। कुछ बदू यहूदी और ईसाई धर्म को भी मानते हैं। मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप में इस प्रथा पर बड़े पैमाने पर अमल होता है।

(फोटो: साभार अल अरबिया)

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​जुदेआ, नगेव और सिनाई प्रायद्वीप

​जुदेआ, नगेव और सिनाई प्रायद्वीप

जुदेआ को अरबी और उर्दू में यहूदिया के नाम से जानते हैं। यह लैंड ऑफ इसराइल और फिलिस्तीन के दक्षिण में स्थित पहाड़ी इलाका है।

नेगेव को अरबी और उर्दू में अन नकब भी कहा जाता है। यह दक्षिण इजरायल का रेगिस्तानी इलाका है।

सिनाई प्रायद्वीप मिस्र का एक त्रिकोणीय प्रायद्वीप है जिसके उत्तर में भूमध्य सागर और दक्षिण में लाल सागर है।

(फोटो: साभार अल अरबिया)

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​क्या होता है?

​क्या होता है?

किसी गंभीर अपराध के लिए इस रस्म का सहारा लिया जाता है।

इस पूरे रस्म को अंजाम देने वाले शख्स का नाम मुबाशा होता है। जब पूरी प्रक्रिया अंजाम दी जाती है तो वहां कुछ गवाह मौजूद होते हैं।

लोहे की छड़ या चम्मच को खूब गर्म कर लिया जाता है। जब वह बिल्कुल लाल हो जाता है तो आरोपी को उस छड़ या चम्मच को तीन बार चाटने के लिए कहा जाता है। अगर व्यक्ति की जीभ पर जले का निशान पाया जाता है तो माना जाता है कि वह झूठ बोल रहा/रही थी।

बाद में आरोपी को कुल्ला करने के लिए पानी दिया जाता है।

(फोटो: साभार अल अरबिया)

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​सार्वजनिक परीक्षा

​सार्वजनिक परीक्षा

इस कुप्रथा को सार्वजनिक रूप से अंजाम दिया जाता है। दोनों पक्ष पूरी तैयारी के साथ परीक्षा स्थल पर पहुंचते हैं। इससे पहले दोनों पक्षों को चाय भी पिलाई जाती है। एक खास बात यह भी है कि इसमें महिलाओं को भी उपस्थित रहने की अनुमति दी जाती है। वैसे आमतौर पर बदू समुदाय की अन्य न्यायिक सुनवाई के दौरान महिलाओं को आने की इजाजत नहीं दी जाती है।

(फोटो: साभार अल अरबिया)

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मुबाशा

मुबाशा

बिशा को अंजाम देने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ मुबाशा को ही होता है। यह अधिकार एक ही परिवार के पास एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ट्रांसफर होता रहता है। बिशा की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले मुबाशा पूरा मामला सुनता है। बदू समाज में बिशा को अंजाम देने वाले बहुत ही कम लोग रह गए हैं।

(फोटो: साभार अल अरबिया)


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शुरुआत

शुरुआत

ऐसा माना जाता है कि इसकी शुरुआत सऊदी अरब के कुछ बदू समुदाय में हुई। बदू न्याय प्रणाली में सच का पता लगाने के लिए बिशा एक अहम रस्म है।


कहा जाता है कि दक्षिणी सऊदी अरब में एक बहुत ही शक्तिशाली आदमी वीमर अबू अय्याद था। एक बार कोई उसका सामान लूट लेता है। वह दोषी का पता लगा लेता है लेकिन कोई उसका गवाह नहीं होता है। वीमर आरोपी से कहता है कि तुम गर्म होकर लाल हुए लोहे की छड़ को तीन बार जीभ से चाटो। अगर तुम दोषी नहीं होगे तो तुम्हारी जीभ नहीं जलेगी। यह सुनकर संदिग्ध भाग जाता है। संदिग्ध के भागने से सब मान लेता है कि वही दोषी था। उसके बाद इसने एक कुप्रथा का रूप ले लिया।

(फोटो: साभार अल अरबिया)

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​कानूनी हैसियत

​कानूनी हैसियत

ब्रिटिश शासन के दौरान इन इलाकों में बिशा को गैर कानूनी करार दिया गया था। बिशा इजरायली न्यायिक प्रणाली में भी गैर कानूनी है। चूंकि यह कुप्रथा अरब में इस्लाम के उदय से पहले की है, इसलिए शरीया में भी इसकी कोई जगह नहीं है। ज्यादातर अरब देशों ने भी बिशा जैसी कुप्रथा की आलोचना की है। वैसे अब बदू समाज के अधिकांश लोग इंसाफ के लिए कोर्ट का रुख करते हैं तो यह कुप्रथा धीरे-धीरे समाप्त होने के कगार पर है।

(फोटो: साभार डेली मेल यूके)

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​स्रोत

​स्रोत

लेखक ऑस्टिन केनेट ने इस पर एक किताब लिखी जो 1925 में प्रकाशित हुई। किताब का नाम Bedouin Justice: Law and Custom Among the Egyptian Bedouin है। इसके अलावा जॉन मुरे की किताब Back Garden of Allah, by Claude Scudamore Jarvis और कई किताबों में विस्तार से इस बदुओं की न्यायिक प्रणाली पर प्रकाश डाला गया है। उन्हीं किताबों के विवरण के आधार पर यह स्टोरी तैयार की गई है।

(फोटो: साभार अल अरबिया)


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