हेलिकॉप्टर ईला

फ़िल्म रिव्यू

कुछ वक्त पहले काजोल और शाहरुख की सुपरहिट जोड़ी ‘दिलवाले’ में नजर आई, लेकिन फिल्म बॉक्स आफिस पर कुछ खास नहीं कर पाई। इस फिल्म के बाद काजोल ने एकबार फिर लंबा ब्रेक लिया और अब अपनी होम प्रॉडक्शन कंपनी के बैनर तले बनी बनी इस फिल्म में यकीनन साबित कर दिखाया कि ऐक्टिंग के मामले में काजोल का जवाब नहीं। हम आपसे इस फिल्म को देखने की सिफारिश सिर्फ इसलिए कर रहे है कि इस फिल्म में काजोल अपनी शानदार दमदार ऐक्टिंग के दम पर आपका दिल जीत सकती है। काश, इस प्रोजेक्ट पर फिल्म के डायरेक्टर और राइटिंग टीम भी थोड़ी ज्यादा मेहनत करती तो फिल्म की सुस्त रफ्तार और कमजोर कहानी में कुछ रफ्तार आ पाती। हेलिकॉप्टर ईला को एक ऐसी फिल्म की कैटेगिरी में रखा जा सकता है जो मां-बेटे के बीच इमोशनल रिश्ते के साथ साथ सिंगल मदर की मुश्किलें और उसका दर्द भी शेयर करती है। अपने बेटे की की बेहतरीन परवरिश और उसे अपना पूरा वक्त देने की चाह में मां ने अपने कामयाब करियर को अलविदा कर दिया, लेकिन डायरेक्टर सरकार एक सिंगल मदर के इस स्ट्रगल और उसके ख्वाबों को पूरी ईमानदारी के साथ पर्दे पर पेश करने में पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाए। करीब दो घंटे की फिल्म के साथ अगर दर्शक पूरी तरह से बंध नहीं पाता तो इसकी वजह कमजोर स्क्रीनप्ले और सुस्त निर्देशन। बता दें, प्रदीप सरकार के निर्देशन में बनी यह फिल्म आनंद गांधी के गुजराती नाटक बेटा कागदो पर आधारित है,

काजोल अपने पहले सीन से लेकर आखिर तक फिल्म में ऐक्टिंग से जान भरने का काम लिया, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट ने पूरा खेल बिगाड़ दिया. वहीं फिल्म मे काजोल के बेटे का रोल निभा रहे ऋद्धि सेन ने अपने किरदार को भरपूर तरीके से जिया।

Helicopter-Eela

ट्रेलर: हेलिकॉप्टर ईला

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कहानी: सिंगल मदर ईला रायतुरकर (काजोल) अपने बेटे विवान (ऋद्धि सेन) की बेहतर परवरिश के लिए अपने कामयाब सिंगर बनने के सपने का उस वक्त छोड़ देती है जब उसका सपना साकार होने वाला है। उस वक्त ईला कामयाबी के बेहद पास है, लेकिन वह चाहती है कि करियर शुरू करने से पहले शादी करके घर बसा लिया जाए, अपने ब्वॉय फ्रेंड अरुण (तोता राम चौधरी) के साथ मैरेज करके ईला सिंगर बनने के सपने को साकार करने में लग जाती है, इसी बीच ईला मां बन जाती है, हालात कुछ ऐसे बनते है कि अरुण एक दिन अचानक गायब हो जाता है, ईला अब सिंगर बनने का सपना त्याग कर अपने बेटे विवान की बेहतरीन परवरिश और उसके साथ पूरा वक्त गुजारने के लिए खुद को विवान और घर के बीच समेट लेती है। विवान को पसंद नहीं कि हर वक्त उसकी मां उसका साया बनकर रहे, कहानी में टर्निंग प्वाइंट उस वक्त आता है जब विवान के साथ और ज्यादा वक्त गुजारने की चाह में ईला अपनी अधूरी स्टडी पूरी करने का फैसला करके उसी के कॉलेज में ऐडमिशन लेती है और यहां भी दोनों एक ही क्लास रूम में आमने सामने हैं।

ऐक्टिंग: यकीनन, काजोल ने फिल्म के पहले सीन से लेकर आखिर सीन तक अपनी बेहतरीन ऐक्टिंग से जान डाली है। काजोल के बेटे विवान के रोल में ऋद्धि सेन ने परफेक्ट ऐक्टिंग की है। अन्य कलाकारों में तोता राय चौधरी अपने रोल में जमे है।

डायरेक्शन/स्क्रिप्ट: डायरेक्टर प्रदीप सरकार ने फिल्म की शुरुआत तो काफी अच्छी की लेकिन 15-20 मिनट के बाद ही फिल्म बोझिल लगने लगती है। इंटरवल से पहले की फिल्म ईला के आसपास घूमती है.वहीं इंटरवल के बाद कहानी को जबरन ऐसे खींचा गया कि दर्शक बोरियत महसूस करने लगते है। हां, इस दौरान भी काजोल ने अपनी लाजवाब ऐक्टिंग से कई बार हंसाया और कई बार आंखें नम भी कीं। डायरेक्टर प्रदीप सरकार ने एक कमजोर स्क्रिप्ट पर एक कमजोर फिल्म बनाई जो टिकट खिड़की पर शायद ही टिक पाए।

फिल्म का एक गाना यादों की अलमारी हॉल से बाहर आने के बाद भी याद रहता है।

क्यों देखें: अगर आप काजोल के पक्के फैन हैं तो आप इस फिल्म को सिर्फ अपनी चहेती ऐक्ट्रेस की शानदार ऐक्टिंग के लिए ही देखने जाएं।

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