बेटी की विदाई का दिन है सिंदूर खेला, लिया और दिया जाता है लंबे सुहाग का आशीर्वाद

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दुर्गा पूजा के आखिरी दिन पश्चिम बंगाल में महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं। इसके बाद सभी महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं. यह करीब चार सौ साल पुरानी परंपरा है। इस शुभ दिन और त्योहार को सिंदूर खेला के नाम से जाना जाता है।

सिंदूर खेला, सुहागिन महिलाओं का त्योहार माना जाता रहा है। इसमें विधवा, तलाकशुदा, किन्नर और नगरवधुओं को शामिल नहीं किया जाता था। हालांकि पिछले कुछ साल में सामाजिक बदलाव की दिशा में कदम उठाए गए और हर महिला की भागीदारी सिंदूर खेला में देखने को मिलने लगी है।

सिंदूर खेला में पान के पत्ते से मां दुर्गा के गालों को स्पर्श किया जाता है। फिर उनकी मांग और माथे पर सिंदूर लगाया जाता है। इसके बाद मां को मिठाई खिलाकर भोग लगाया जाता है। फिर सभी महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर लंबे सुहाग की कामना करती हैं।

धार्मिक आस्था है कि नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा पृथ्वी पर अपने मायके आती हैं और नौ दिन तक यहां रहती है।दसवीं के दिन माता ससुराल के लिए विदा होती हैं. उनकी विदाई के उत्सव को सिंदूर खेला के रूप में मनाया जाता है। इसके पीछे भाव है कि बेटी मायके से विदा हो रही है, उसका सुहाग बना रहे और खुशियां बनी रहें।

लेकिन मां दुर्गा तो जगत जननी हैं, इसलिए उन्हें सिंदूर लगाकर महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और मां से अपने सुहाग की लंबी आयु के लिए कामना करती हैं।

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