दिल्ली में क्यों महंगा है पेट्रोल?

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मोदी सरकार के लिए तेल की कीमतों का सिरदर्द अभी दूर नहीं हो पा रहा. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ रहे हैं. चार अक्टूबर को सरकार ने अपनी ओर से ढाई रुपये प्रति लीटर राहत दी थी. इसमें केंद्र सरकार की ओर से डेढ़ रुपये की एक्साइज ड्यूटी में कमी और तेल मार्केटिंग कंपनियों की ओर से एक रुपये की राहत दी गई थी. कई बीजेपी शासित राज्यों ने भी ढाई रुपये प्रति लीटर की राहत लोगों को दी थी. यानी पांच रुपये प्रति लीटर पेट्रोल और इतना ही डीज़ल सस्ता हुआ था.  लेकिन विपक्ष के शासन वाले राज्यों में लोगों को अब भी ढाई रुपए की राहत का इंतजार है. नतीजा यह है कि दिल्ली जैसे राज्यों में लोग पड़ोसी राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश से तेल ले रहे हैं और इसका विपरीत असर दिल्ली के पेट्रोल पंपों की सेहत पर पड़ रहा है.

इस बीच केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि पेट्रोलियम पदार्थों पर अब सब्सिडी नहीं दी जाएगी. यानी तेल मार्केटिंग कंपनियां अब अपनी ओर से तेल की कीमतों में राहत नहीं देंगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों के मुताबिक ही दाम तय किए जाएंगे. वहीं केंद्र सरकार के लिए दूसरी मुसीबत ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध हैं जो चार नवंबर से लागू हो जाएंगे. यही वजह है कि तेल आयात के दूसरे विकल्पों पर चर्चा के लिए आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वित्त मंत्री अरुण जेटली और पेट्रोलियम मंत्री धर्में प्रधान की बैठक हुई. सरकार कई विकल्पों पर विचार कर रही है. इराक और सऊदी अरब के बाद भारत सबसे ज्यादा ईरान से कच्चा तेल आयात करता है. दो भारतीय तेल कंपनियां ईरान को नवंबर के लिए तेल खरीद का ऑर्डर दे चुकी हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रंप ईरान से तेल खरीदने के खिलाफ चेतावनी दे रहे हैं. ऐसे में भारत के सामने एक विकल्प ईरान को डॉलर के बजाए रुपये में भुगतान करना भी है.

सरकार के सामने दूसरी दिक्कत है कि डॉलर के मुकाबले रुपये की घटती कीमत. इसकी वजह से कच्चे तेल के आयात का बिल लगातर बढ़ रहा है. व्यापार घाटे पर भी इसका असर हो रहा है. हालांकि राहत की बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आ रही है. इसके बावजूद सरकार एक्साइज ड्यूटी में अब आगे कमी करने में खुद को असमर्थ पा रही है क्योंकि ऐसा करने पर चालू बजट घाटे पर विपरीत असर पड़ेगा. हालांकि चार अक्टूबर को एक्साइज ड्यूटी में डेढ़ रुपये की कमी करते समय वित्त मंत्री ने कहा था कि इससे मौजूदा वित्तीय वर्ष की छमाही में दस हजार पांच सौ करोड़ का ही बोझ पड़ेगा जो मामूली है. लेकिन इसके बावजूद सरकार अब आगे राहत नहीं दे पाएगी. पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का कार्यक्रम घोषित हो चुका है. आदर्श आचार संहिता लग चुकी है. ऐसे में कोई भी कटौती सवाल खड़े कर सकती है. पर ऐसा क्यों हो रहा है कि कच्चे तेल में कमी के बावजूद पेट्रोल-डीजल के दामों में कमी नहीं हो पा रही.

चार अक्टूबर को जब दामों में कमी की गई थी तब कच्चे तेल की कीमत 81 डॉलर प्रति बैरल थी. तब पेट्रोल का दाम 84 रुपये और डीज़ल का दाम 75.45 रुपये प्रति लीटर था. लेकिन अब इसमें पांच डॉलर की कमी आ चुकी है. लेकिन तब से पेट्रोल के दाम में 98 पैसे प्रति लीटर और डीज़ल के दाम में 1.95 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी हो चुकी है. यानी दिल्ली में पेट्रोल का दाम अब 82.48 रुपए प्रति लीटर और डीजल का दाम 74.9 रुपए प्रति लीटर हो गया है.

दिल्ली में दिक्कत यह भी है कि यहां की आम आदमी पार्टी सरकार ने बीजेपी शासित राज्यों की तरह ढाई रुपये प्रति लीटर की राहत नहीं दी है. इसका नतीजा यह हुआ है कि दिल्ली में पड़ोसी राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश की तुलना में पेट्रोल डीजल की कीमत ज्यादा है. दो हफ़्ते पहले तक दिल्ली से सटे यूपी-हरियाणा में पेट्रोल और डीज़ल महंगा मिलता था जिसके चलते लोग तेल भरवाने दिल्ली आते थे. लेकिन अब हालात पलट गए हैं. गाजियाबाद के पेट्रोल पंपों ने बोर्ड भी लगा दिए हैं कि यहां दिल्ली से सस्ता पेट्रोल मिलता है.  

दिल्ली के मुकाबले हरियाणा में पेट्रोल 1.95 रुपये और उत्तर प्रदेश में 2.59 रुपये प्रति लीटर सस्ता है. दिल्ली पेट्रोल डीलर एसोसिएशन को डर है कि इसकी वजह से चालू तिमाही में दिल्ली में पेट्रोल की बिक्री में करीब 25 फीसदी और डीजल की बिक्री में पचास फीसदी की कमी तक आ सकती है. दिल्ली के कुछ पेट्रोल पंपों पर कर्मचारियों के वेतन में कटौती कर दिए जाने की खबरें भी मिली हैं. एसोसिएशन ने इसके विरोध में 22 अक्टूबर को राजधानी दिल्ली के सभी पेट्रोल पंपों को बंद रखने की चेतावनी दी है. दिल्ली में बढ़े दामों से जनता भी परेशान है.

उधर दिल्ली सरकार वैट में कटौती से इनकार कर चुकी है. उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया का कहना है कि सरकार पहले ही घाटे में है इसलिए टैक्स में कटौती नहीं हो सकती. जहां केंद्र सरकार ने दाम दस रुपये तक बढ़ा दिए और पूरा मुनाफा उसे मिला. अब वह डेढ़ रुपये की कटौती कर राज्यों से ढाई रुपये की कटौती करने को कह रहा है. लेकिन विपक्षी पार्टियां इससे संतुष्ट नहीं हैं. बीजेपी इसके विरोध में प्रदर्शन कर रही है. वहीं कांग्रेस का कहना है कि अगर अरविंद केजरीवाल चाहें तो वे वैट दरों को उसी स्तर पर ला सकते हैं जैसा शीला दीक्षित के वक्त था. केजरीवाल सरकार ने जुलाई 2015 में वैट में बढोत्तरी की थी.

दिल्ली में अभी पेट्रोल पर 27 फीसदी और डीजल पर 16.75 फीसदी वैट लिया जाता है. इसका मतलब है कि पेट्रोल पर 17.49 रुपये और डीज़ल पर 10.67 रुपये वैट लगता है.

जाहिर है अगर दिल्ली सरकार चाहे तो अपनी ओर से लोगों को राहत दे सकती है. लेकिन ऐसा लगता है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार के लिए यह अर्थव्यवस्था का नहीं बल्कि सियासी मुद्दा है ताकि वे केंद्र सरकार पर हमले करती रहे. लेकिन इसके अपने नुकसान भी हैं. डीजल की गुणवत्ता का सीधा रिश्ता दिल्ली की हवा से है. ऐसे में देखना होगा कि आखिर कब तक दिल्ली के लोग महंगा तेल खरीदते रहेंगे.

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(अखिलेश शर्मा NDTV इंडिया के राजनीतिक संपादक हैं)

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