जीवन में सुख-शांति और आनंद प्राप्त करने का केवल यही है एक मार्ग

राशि


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स्वामी अवधेशानन्द गिरी
जीवन का दूसरा नाम संघर्ष है। अतः जीवन में परेशानियां स्वाभाविक हैं। दुख के गहन अंधकार के बाद ही सुख का सूरज निकलता है। जीवन में सुख-दुख लगे ही रहते हैं। इसलिए किसी भी परिस्थिति में घबराने की जरूरत नहीं है। कभी-कभी व्यक्ति परिस्थिति से तब पीड़ित हो जाता है जब वह ईश्वर को भूल जाता है। वह दुख पाता है और फिर भाग्य को दोष देता है, ईश्वर को कोसता है। आत्मचिंतन करने पर वह पाता है कि उसकी आत्मा उसके किए गए कार्यों के बारे में उसे अहसास कराती है कि जो दुख या सुख उसके जीवन में आता है, वह भाग्य का नहीं, उसके अपने ही कर्मों का फल है।

अगर आप जीवन में सुख-शांति और आनंद प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको ईश्वर का सुमिरन करते हुए सचाई के मार्ग पर चलना होगा। जीवन की प्रत्येक अवस्था या परिस्थिति को उसी परम पिता परमेश्वर की मर्जी समझकर स्वीकार करना होगा। फिर आप देखेंगे कि आपका जीवन सुखमय हो गया है। आप विपरीत परिस्थितियों का भी आसानी से सामना करने लगते हैं। हर कार्य आपको आसान और सुख देने वाला लगने लगता है।

नीति शास्त्र में कहा गया है कि दुख को भी सुख के रूप में देखने की दृष्टि ही एक सामान्य व्यक्ति को विशिष्ट बना देती है। कभी उदित होते सूर्य को देखिएगा। फिर देखिएगा कि उसमें अस्त होते समय कोई अंतर होता है क्या? नहीं। उसका मुखमंडल दोनों स्थितियों में दिव्य लालिमा से चमक रहा होता है। महापुरुषों के जीवन में आप इस स्थिति को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। राम-कृष्ण आदि इसके उदाहरण हैं। तप का अर्थ है दुख को सुख की तरह सहज भाव से स्वीकार करना। तब वह दुख कहां रहा! भूख-प्यास को जब स्वयं स्वीकार किया गया तो वह एक धार्मिक कृत्य-उपवास हो गया अर्थात स्वयं के पास। आत्मा के साथ रहने का एक पवित्र साधन।

एक प्रसिद्ध संत अपने शिष्यों के साथ पैदल भ्रमण को निकले। एक निर्माणाधीन मंदिर के पास उनकी दृष्टि तीन मजदूरों पर पड़ी। उन्होंने उत्साहपूर्वक पहले मजदूर से पूछा, ‘क्यों भाई क्या कर रहे हो?’ उसने उत्तर दिया, ‘गधे की तरह जुटे हुए हैं। देख नहीं रहे हो? दिनभर काम करने पर थोड़ा-बहुत मिल जाता है, पर इतने के लिए ठेकेदार मानो जान निकाल लेता है।’ यही प्रश्न दूसरे से करने पर वह बोला, ‘मंदिर बन रहा है। हमारी तो किस्मत में यही था कि मजदूरी करें, मजदूरी कर रहे हैं।’ तीसरे ने भावभरे हृदय से उत्तर दिया, ‘भगवान का घर बन रहा है। मुझे तो बड़ी प्रसन्नता है कि मेरे पसीने की कुछ बूंदें भी इसमें लग रही हैं। जो भी मिलता है, उसी में मुझे खुशी है। गुजारा भी चल जाता है और प्रभु का काम भी हुआ जा रहा है।’

संत ने शिष्यों से कहा, ‘यह अंतर है तीनों के काम करने के ढंग में। मंदिर तीनों बना रहे हैं, पर एक गधे की तरह मजदूरी कर रहा है, दूसरा भाग्य के नाम पर दुहाई देता हुआ वक्त बिता रहा है। तीसरा ही है जो समर्पण भाव से काम पूरा कर रहा है। यही अंतर इनके काम की गुणवत्ता में देखा जा सकता है। क्या काम किया जा रहा है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसे किस उद्देश्य और किस भावना से किया जा रहा है, यह मायने रखता है।’

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