एक जरूरी लड़ाई

विचार

अभी जब देश नारी शक्ति की चरम प्रतीक समझी जाने वाली देवी दुर्गा की उपासना में लगा है, स्त्रियों का एक तबका यौन शोषण के मामले पर एकजुट हो रहा है। विदेश में बस गई एक फिल्म अभिनेत्री के बयान से शुरू हुआ यह किस्सा छिटपुट करके भारत के खास अपने ‘#मीटू’ अभियान की शक्ल लेता जा रहा है। विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी स्त्रियां अपने साथ हुए अत्याचार के ब्योरे दे रही हैं और कुछेक मामलों में दोषी को अलग-थलग करने या उसे सजा देने की मांग भी कर रही हैं। इस तरह फिल्म, टीवी, मॉडलिंग, पत्रकारिता और साहित्य से लेकर राजनीति तक से जुड़े कई नामी-गिरामी चेहरों से पर्दा हट रहा है।

स्त्रियों के हृदयविदारक किस्से बता रहे हैं कि इज्जतदार जगहों पर होना और शिक्षित-संभ्रांत दिखना किसी पुरुष के सभ्य होने की गारंटी नहीं है। किसी भी तरह से प्रभावपूर्ण स्थिति में पहुंच गए कुछेक पुरुष यह मानकर चलते दिख रहे हैं कि उनके मातहत काम करने वाली कोई भी स्त्री उनकी यौन पिपासा की पूर्ति के लिए स्वाभाविक रूप से उपलब्ध है। अगर महिला आसानी से इसके लिए राजी नहीं होती तो वह लालच देकर या ताकत का इस्तेमाल करके अपनी ख्वाहिश पूरी करना चाहता है। वैसे यह बीमारी भारत जैसे सामंती मूल्यों वाले समाज में ही नहीं, विकसित और आधुनिक समझे जाने वाले अमेरिकी समाज में भी है।

पिछले साल अमेरिका और यूरोप में चले मीटू कैंपेन ने हॉलिवुड समेत कई नामी-गिरामी दायरों को हिलाकर रख दिया था। अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने प्रख्यात फिल्म निर्माता हार्वी वाइंस्टाइन पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। इसके बाद तो कई अभिनेत्रियों ने अपनी पीड़ा बयान की। इसी क्रम में यह हकीकत भी सामने आई कि स्त्री-पुरुष संबंधों के मामले में पुरुषों के दिमागी जाले को साफ करने का काम आज भी पूरी दुनिया में बचा हुआ है। पुरुष के भीतर से नियंता होने का भाव खत्म होना जरूरी है। यह तभी संभव है जब समाज में प्रतीकात्मक रूप से नहीं, वास्तविकता के स्तर पर स्त्री-पुरुष बराबरी कायम हो। भारत में महिलाओं को बहुत लंबी लड़ाई लड़नी है। यह सही है कि मीटू में सामने आए सभी दोषियों को सजा दिलाना बहुत कठिन है, लेकिन इससे प्रशासन और समाज में एक संदेश जरूर गया है। इस आंदोलन की एक सीमा यह भी है कि अभी यह उन्हीं महिलाओं तक सीमित है जो पढ़ी-लिखी और सोशल मीडिया पर ऐक्टिव हैं। देश में न जाने कितनी अशिक्षित, गरीब महिलाएं रोज प्रताड़ना झेल रही हैं। उनकी आवाज न जाने कब सामने आएगी।

सरकार को महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ज्यादा प्रो-ऐक्टिव होना चाहिए। लेकिन अभी ऐसे आरोपों के घेरे में एक केंद्रीय मंत्री भी हैं, हालांकि मामला उनके मिनिस्टर होने से पहले का है। उनके मंत्रिमंडल में रहते सरकार अपना सुरक्षा संदेश स्त्रियों तक ठीक से पहुंचा पाएगी या नहीं, यह उसे जल्द सोचना होगा।

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