इस तरह के व्यक्ति से प्रकृति छीन लेती है सारी खुशियां

राशि


happyness

विनोद कुमार यादव
सिकंदर जब दुनिया को जीतने निकला तो रास्ते में उसकी मुलाकात यूनान के प्रसिद्ध फकीर डायोजनीज से हुई। डायोजनीज ने उससे पूछा- कहां जा रहे हो? सिकंदर ने उत्तर दिया- हिंदुस्तान जीतने। डायोजनीज ने फिर पूछा कि हिंदुस्तान जीतकर क्या करोगे? सिकंदर ने उत्तर दिया- दुनिया जीतूंगा। फकीर ने फिर पूछा- दुनिया जीतकर क्या करोगे? सिकंदर ने उत्तर दिया- दुनिया जीतकर मैं चैन से जीवन व्यतीत करूंगा। फकीर ने कहा- निर्दोषों की हत्याएं करके तुम्हें चैन कैसे मिलेगा? डायोजनीज ने सिकंदर को परामर्श दिया कि आनंदपूर्वक जीवन जीने के लिए सृजन और सेवा का सहारा लो, न कि विध्वंस का।

दरअसल, भौतिक पदार्थों में खुशी तलाशना मृग मरीचिका के समान है। वस्तुत: खुशी एक आंतरिक भावदशा है। पदार्थों से प्राप्त होने वाली खुशी चिरकालिक कदापि नहीं हो सकती। मशहूर ब्रिटिश अर्थशास्त्री रिचर्ड लेयर्ड ने अपनी किताब ‘द ओरिजिंस आफ हैपिनेस’ में लिखा है- जिन लोगों में उच्च स्तरीय उदारता व सोशल सपोर्ट की भावना प्रबल होती है, उनके चेहरे पर आत्मसंतुष्टि व आंतरिक प्रसन्नता की चमक हमेशा दिखाई देती है।

जिन देशों के लोग हाई-फाई बातें करने के बजाय जमीनी स्तर पर एक-दूसरे से जुड़कर, समस्त पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं, वे अंदरूनी तौर पर ज्यादा खुशमिजाज होते हैं। उनका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य भी औरों से बेहतर होता है। इसके उलट हमारी स्टीरियोटाइप जीवन-शैली व श्रेष्ठता का भाव हमारी परेशानियों का मूल कारण है। इसकी वजह से हम दूसरों को सपोर्ट करने में चतुराई करने लगते हैं, हमारे हृदय से सहिष्णुता का लोप होने लगता है। हमारा यही अड़ियल रवैया हमारी आंतरिक खुशियों के स्रोत को संकरा कर देता है।

नब्बे के दशक के बाद हमारे देश के लोगों के सामाजिक जीवन में तेजी से बदलाव आया है। लोग समृद्धि को लेकर अति उत्साहित नजर आते हैं, किंतु इस होड़ में बेहतरी का मतलब भौतिक संसाधन इकट्ठा करना हो जाता है। ऐसे में त्याग, उदारता, समर्पण, सहिष्णुता जैसे आंतरिक खुशी देने वाले भाव गौण हो जाते हैं। हालांकि परमात्मिक आनंद से लबरेज व्यक्ति ज्यादा प्रॉडक्टिव व क्रिएटिव होता है। असलियत में असंतोष की भावना जब मनुष्य के भीतर प्रबल होती है तो उसके भीतर की भावदशा नेगेटिविटी से भर जाती है और उसका झुकाव लोभ-लालच की ओर सहज ही हो जाता है।

वस्तुतः व्यक्ति की जरूरतें बहुत सीमित होती हैं, किंतु वह अपनी इच्छा व लालसाओं का आकार बड़ा कर लेता है। इतना ही नहीं, वह लालसाओं के साथ-साथ अपने अहम को भी बड़ा बना लेता है। अहंकार के वशीभूत होकर इंसान सदैव इसलिए भौतिक संपदा एकत्र करता रहता है कि उसके पास जितनी संपत्ति होगी, समाज में वह उतना ही बड़ा आदमी कहलाएगा। लेकिन मनुष्य की जरूरतें तो पूरी हो सकती हैं, किंतु इच्छाएं नहीं। प्रकृति भी बड़ी नियामक है। वह हमारी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में अपनी सारी कायनात उड़ेल देती है, किंतु यह भी ध्रुव सत्य है कि प्रकृति लोभ-लालच में फंसे व्यक्ति की खुशी छीनकर उसके भीतर बेचैनी उत्पन्न कर देती है।

Products You May Like

Articles You May Like

Ind vs Aus, 2nd Test, Day 2 live: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच दूसरे दिन का खेल कुछ देर में होगा शुरू
भावुक हुए शिवराज सिंह, कहा- जीना यहां-मरना यहां; मध्यप्रदेश वासियों को मुझसे कष्ट हुआ तो क्षमा करें
Isha Ambani Wedding: ईशा अंबानी की शादी में जाह्नवी कपूर और खुशी कपूर पहुंचीं ऐसे अंदाज में, मुंह से निकल जाएगा OMG- देखें Video
उपेंद्र कुशवाहा बोले, मैंने पहले ही कहा था कि मोदी पीएम नहीं बनने चाहिए, 2019 में वापसी असंभव
यहां हैं नौकरी के मौके, करें आवेदन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *