बंधन से ज्यादा गांठें

विचार

बीएसपी नेता मायावती की घोषणा ने आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन की अटकलों पर विराम लगा दिया। इस गठबंधन की चर्चा वैसे तो उत्तर प्रदेश के लोकसभा उपचुनावों से शुरू हुई थी, लेकिन कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में सोनिया गांधी और मायावती की नजदीकी दर्शाती तस्वीरें मीडिया में आने के बाद इसे पंख लग गए थे। राजनीति में पब्लिक परसेप्शन हमेशा अहम भूमिका निभाता है, लेकिन वह राजनीतिक तर्कों के भी परे जा सकता है, यह हकीकत जब-तब ही सामने आती है।

एक तस्वीर से शुरू हुई इस चर्चा का गुब्बारा कभी न कभी फूटना ही था, सो यह फूटा। मायावती ने साफ कर दिया कि कांग्रेस के साथ वह फिलहाल कोई गठबंधन नहीं करने जा रहीं। पर इस फैसले की जो वजह उन्होंने बताई, वह काफी दिलचस्प है। गठबंधन न होने का ठीकरा उन्होंने दिग्विजय सिंह के सिर पर फोड़ा और राहुल व सोनिया गांधी को आलोचना की जद से बाहर रखा। इसका मतलब फिलहाल यही निकाला जा रहा है कि लोकसभा चुनावों के दौरान वह गठबंधन की संभावना खुली रखना चाहती हैं। बहरहाल, आगे जो भी हो, अभी एक बात तो साफ है कि विधानसभा चुनाव में जा रहे तीनों हिंदीभाषी राज्यों में कांग्रेस को बीजेपी के अलावा कुछ ताकत बीएसपी से निपटने में भी लगानी होगी। इस महत्वपूर्ण मुकाबले में चुनाव कार्यक्रम घोषित होने से ठीक पहले हुई इस घोषणा से कांग्रेस को माहौल के स्तर पर थोड़ा नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन पहली नजर में लगता है कि दबाव में आकर अगर वह बीएसपी को उसकी वास्तविक शक्ति की कई गुना सीटें दे देती तो इससे उसका और ज्यादा नुकसान होता। राष्ट्रीय पार्टियों की जमीनी ताकत विधानसभा चुनाव से ही तय होती है। वहां किसी अमूर्त लक्ष्य के लिए अपने जमे-जमाए कार्यकर्ता की सीट काट देना पार्टी की कब्र खोद देने जैसा ही है।

जाहिर है, आम चुनाव में अगर कोई महागठबंधन सामने आना है तो आत्मसमर्पण को इसकी बुनियाद नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए राजनीतिक दलों को अपनी वास्तविक शक्ति के आधार पर सौदेबाजी करनी होगी, और इस शक्ति को आंकने के लिए विधानसभा चुनाव से बेहतर मौका और कोई नहीं हो सकता। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव से पहले अगर कोई अप्रत्याशित बदलाव न देखने को मिले तो दृश्य पिछले एक-दो वर्षों से बिल्कुल स्पष्ट है। बीजेपी इन राज्यों में सरकार विरोधी रुझान का सामना कर रही है जबकि कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि खुद को आपसी टकरावों से मुक्त रखकर अपने जमीनी ढांचे के बल पर इस रुझान का वह ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा ले। तिकोनी लड़ाई थोड़ी-बहुत छत्तीसगढ़ में ही दिखेगी, बाकी दोनों राज्यों में मुकाबला सीधा है। लिहाजा कुछ दिन बाद मायावती की इस घोषणा का कुछ खास अर्थ दिखेगा, ऐसा लगता नहीं।

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