सड़क पर किसान

विचार

एक बार फिर किसान अपनी मांगों को लेकर आंदोलन के रास्ते पर हैं। भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) की अगुआई में यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब और उत्तर भारत के कुछ अन्य राज्यों के किसानों ने हरिद्वार से किसान क्रांति यात्रा निकाली। यात्रा के दसवें दिन वे दिल्ली के किसान घाट पहुंचना चाहते थे पर पुलिस ने उन्हें दिल्ली की सीमा पर ही रोक दिया। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने किसानों के प्रतिनिधियों से बातचीत की और बयान जारी किया कि उनकी नौ प्रमुख मांगों में से सात मान ली गई हैं। लेकिन सरकार के इस आश्वासन के बाद भी किसान संतुष्ट नहीं दिख रहे।

ध्यान रहे, देश भर के किसान पिछले कुछ समय से अलग-अलग दायरों में अपनी मांगों को लेकर लगातार आंदोलन कर रहे हैं पर आश्वासनों के बावजूद उनकी परेशानियां दूर नहीं हो पा रही हैं। पिछले साल मध्य प्रदेश के मंदसौर में ऐसे ही एक आंदोलन के दौरान पुलिस ने किसानों पर फायरिंग की, जिसमें 6 किसानों की मौत हो गई थी और कई बुरी तरह घायल हुए थे। मार्च 2018 में महाराष्ट्र के 30 हजार किसान नासिक से पांच दिन लंबा पैदल सफर करके मुंबई की विधानसभा का घेराव करने पहुंचे। उसके बाद तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया जो कई दिनों तक चला।

सभी जानते हैं कि खेती अभी भारत में घाटे का सौदा है। बढ़ती लागत और घटती आमदनी के चलते देश भर के किसानों का जीना मुहाल है, लिहाजा बार-बार उन्हें सड़क पर उतरना पड़ रहा है। इस दिशा में उत्तर भारत के किसानों की एकजुटता सबसे बाद में दिखाई पड़ी है और इसकी धुरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश बना है। यह इलाका पिछले कई वर्षों से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को लेकर चर्चा में था। इस क्षेत्र में राजनीतिक दांव-पेच के तहत हिंदू-मुस्लिम के बीच की दीवार इतनी मजबूत कर दी गई थी कि किसान भी बिखर गए थे।

हालांकि 1980 और 90 के दशकों में इस क्षेत्र के हिंदू-मुसलमान किसान महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में कंधे से कंधा मिलाकर अपने हक की लड़ाई लड़ते नजर आते थे। इस आंदोलन का नतीजा जो भी निकले, लेकिन खुशी की बात है कि वह एकता यहां एक बार फिर देखने को मिल रही है। किसानों ने मिलों द्वारा पिछले साल खरीदे गए गन्ने का पूरा भुगतान कराने की मांग की है और कहा है कि ऐसा न करने वाले शुगर मिल अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की जाए। वे अपनी उपज की कीमत तय करने के लिए स्वामीनाथन कमिटी की रिपोर्ट लागू करने तथा किसानों को पेंशन और मृत किसानों को घर देने की भी मांग कर रहे हैं। उन्होंने डीजल व बिजली के दाम कम करने को कहा है और 10 साल पुराने ट्रैक्टर बंद करने के खिलाफ आवाज उठाई है। तकरीबन यही मांगें पिछले आंदोलनों की भी रही हैं। सरकारों को चाहिए कि वे किसानों से सहज वार्ता में जाएं, उनसे ठोस वादे करें और ईमानदारी से उन्हें पूरा भी करें।

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