मंटो

फ़िल्म रिव्यू

रेणुका व्यवहारे
कहानी: ‘मंटो’ मशहूर लेखक सआदत हसन मंटो की लाइफ पर बनी एक बायॉपिक है, जिसमें उनकी ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव से लेकर विवाद और खुशनुमा पलों को खूबसूरती से पिरोया गया है।

रिव्यू: लेखकों की ज़िंदगी में एक अजीब सा अकेलापन होता है और उस अकेलेपन का साथी उन्हें काल्पनिक कहानियों और किरदारों में मिलता है, जो कहीं न कहीं सच्चाई से भी मेल खाते हैं। लोगों से घिरे होने के बावजूद वे अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं। या यूं कहें कि उन्हें अपनी असल और काल्पनिक ज़िंदगी के बीच तालमेल बिठाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। उर्दू के महान कवि और लेखक सआदत हसन मंटो को काल्पनिक दुनिया अपने आस-पास की असल दुनिया के मुकाबले कहीं ज़्यादा रियल लगी, बावजूद इसके उनकी कल्पना में समाज की कड़वी हकीकत ही रहती, खासकर वह कड़वी सच्चाई, जो उन्होंने खुद करीब से महसूस की।

ऐक्ट्रेस और फिल्ममेकर नंदिता दास ने मंटो की ज़िंदगी में रियल और काल्पनिक समाज के बीच की इसी पृथकता को फिल्मी परदे पर बेहद दिलचस्प और दिल को छू जाने वाले अंदाज़ में उतारा है। मंटो की ज़िंदगी में सेंसर का अहम हिस्सा रहा। उनके लिखे लेखों पर सेंसरशिप से लेकर अश्लीलता तक के केस हुए। सेंसरशिप मंटो की ज़िंदगी में एक ऐसा हिस्सा था, जिसे उन्होंने आजीवन झेला और उस दौरान उनकी कैसी व्यथा, कैसी स्थिति रही होगी, इसे बेहद गहराई और खूबसूरती से नंदिता दास ने फिल्म में दिखाया है। उन्होंने भारत-पाक विभाजन से लेकर पुरुष प्रधान समाज वाली मानसिकता से लेकर धार्मिक असिहष्णुता, बॉम्बे के लिए प्यार जैसे कई वाकयों को दिलचस्प अंदाज़ में दर्शकों के लिए परोसा है।

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फिल्म ‘मंटो’ में अपने किरदार को लेकर बोले नवाजुद्दीन

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कार्तिक विजय की सिनेमटॉग्रफी और रीता घोष के प्रॉडक्शन डिज़ाइन से आजादी से पहले और उसके बाद का एक पर्फेक्ट सीन उभरकर सामने आता है। देखकर लगता है जैसे फिल्म उसी दौर में जाकर शूट की गई हो।

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नवाजुद्दीन सिद्दीकी अब करेंगे सिर्फ लीड किरदार वाले रोल!

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और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के रत्न यानी नवाजुद्दीन सिद्दीकी को भला कैसे भूला जा सकता है। उन्होंने मंटो के किरदार में जान फूंक दी है।

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