दूरसंचार कंपनियों के साथ विवाद कम करना चाहता है DoT

बिज़नेस

प्रतीकात्मक तस्वीर

देविना सेनगुप्ता और अनंदिता सिंह मनकोटिया, मुंबई/नई दिल्ली

टेलिकॉम कंपनियों के साथ विवादों को सरकार कम करना चाहती है। इस वजह से लगभग 80,000 करोड़ रुपये कानूनी मामलों में अटके हैं। इससे टेलिकॉम सेक्टर में विलय और अधिग्रहण में देरी हो रही है और विदेशी निवेशक दूरी बना रहे हैं। टेलिकॉम डिपार्टमेंट (DoT) ने फीस को एकसमान बनाने, कुछ मामलों का निपटारा करने और मामूली उल्लंघनों पर नरम रवैया अपनाने जैसे सुझाव तैयार किए हैं।

सरकारी अधिकारियों ने हमारे सहयोगी अखबार इकनॉमिक टाइम्स को बताया कि DoT इन सुझावों को विचार के लिए लॉ मिनिस्ट्री के पास भेजेगा और उसके बाद उन्हें इन्हें फैसला करने के लिए कम्युनिकेशंस मिनिस्ट्री के पास भेजा जाएगा। एक अधिकारी ने कहा, ‘हम नहीं चाहते कि सरकार को उस रकम का नुकसान हो, जो टेलिकॉम कंपनियों पर बकाया है। टेलिकॉम कंपनियों का अलग नजरिया है और इससे जुर्माना और ब्याज सहित लगभग 80,000 करोड़ रुपये की रकम कानूनी मामलों में फंसी है।’

DoT गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स (GST) के जैसे सभी टेलिकॉम चार्जेज को एकसाथ जोड़ने पर विचार कर रहा है। यह ऐसे मामलों की पहचान करने का भी सुझाव दे सकता है जिन्हें निपटाया जा सकता है या वापस लिया जा सकता है।

अधिकतर विवाद लाइसेंस फीस, स्पेक्ट्रम यूजेज चार्ज (SUC) और वन-टाइम स्पेक्ट्रम फीस (OTSC) जैसे कई चार्ज से संबंधित हैं। इनमें से लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम यूजेज चार्ज की बड़ी हिस्सेदारी होती है। ये चार्ज टेलिकॉम कंपनी के एनुअल एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) पर आधारित हैं। AGR की परिभाषा पर विवाद का मामला कोर्ट में चल रहा है। इस वजह से इससे संबंधित चार्ज को चुनौती दी जाती है और उन पर विभिन्न अदालतों या टेलिकॉम ट्राइब्यूनल ने रोक लगाई है।

एक अधिकारी ने कहा कि AGR की स्पष्ट परिभाषा पर भी विचार किया जा रहा है। टेलिकॉम मिनिस्टर मनोज सिन्हा ने हाल ही में ईटी से कहा था कि बहुत से लंबित मामलों को निपटाने के लिए AGR की सही परिभाषा तय करने की जरूरत है। टेलिकॉम कंपनियां जल्द समाधान की उम्मीद कर रही हैं क्योंकि इससे विलय और अधिग्रहण के समझौतों में देरी हो रही है, बैलेंस शीट को नुकसान हो रहा है और विदेश से फंड जुटाने में उन्हें मुश्किल आ रही है।

उदाहरण के लिए, टेलिकॉम कंपनियों का कहना है कि जब वे स्पेक्ट्रम की ट्रेडिंग या मर्जर और एक्विजिशन करना चाहती हैं तो DoT सरकार के इसके लिए स्वीकृति देने से पहले उनसे बकाया रकम की मांग करता है। टेलिकॉम कंपनियों को इस तरह की मांग पर रोक लगवाने के लिए अदालत के पास जाना पड़ता है।

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