सफलता के शिखर पर पहुंचने के बावजूद क्‍यूं मीडिया के सामने नहीं आना चाहती थी मैरी क्‍यूरी

राशि


marie

संकलन : त्रिलोक चन्द जैन

बालिका मैरी के पिता भौतिकी के शिक्षक थे और माता एक विद्यालय में मुख्य अध्यापिका थीं। वह पढ़ाई के साथ-साथ घर के कामकाज में भी हाथ बंटाती थी। मैरी काफी मेधावी छात्रा थीं। उनका विवाह गणित के प्रफेसर पियरे क्यूरी के साथ हुआ और वह मैरी क्यूरी कहलाने लगीं। वह वैज्ञानिक के साथ-साथ सुघड़ गृहिणी भी थीं। सन 1903 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए वैज्ञानिकों में संयुक्त रूप से हेनरी बेकेरल और प्रफेसर पियरे क्यूरी के साथ मैरी क्यूरी का भी नाम था।

इसके आठ साल बाद यानी कि सन 1911 में मैरी क्यूरी को स्वतंत्र रूप से रसायन में नोबेल पुरस्कार मिला। चारों तरफ उनके नाम की चर्चा थी, लेकिन त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति मैरी क्यूरी को अपनी प्रसिद्धि में अरुचि थी। एक बार एक संवाददाता उनसे मिलने के लिए उनके घर पर पहुंचा। संवाददाता ने देखा कि घर के एक कोने में एक महिला बैठी हुई कोई काम कर रही हैं। संवाददाता को लगा कि वह घर की नौकरानी है और उसने सवाल किया, ‘क्या आप यहां पर काम करती हैं?’ उस महिला ने जवाब दिया, ‘जी हां, कहिए क्या बात है?’ आगंतुक ने फिर पूछा, ‘क्या मालकिन घर पर हैं?’ उस महिला ने कहा, ‘नहीं, वह बाहर गई हैं।’ ‘क्या, वह जल्दी ही लौटेंगी?’ महिला ने जवाब दिया, ‘शायद नहीं।’ तो क्या आप उनके बारे में कुछ बता सकती हैं? अपने काम में मग्न वह महिला लगातार संवाददाता के प्रश्नों का जवाब दे रही थीं।

अब मैरी क्यूरी से रहा नहीं गया, उन्होंने कहा, ‘वह बता गई हैं कि अगर कोई आए और उनके बारे में पूछे तो बस इतना कह देना कि किसी व्यक्ति के बारे में लोगों को उत्सुक होने की अपेक्षा उनकी विचारधाराओं में उत्सुकता रखनी चाहिए।’ संवाददाता अनभिज्ञ था कि जिस महिला से वह संवाद कर रहा था, वह स्वयं मैरी क्यूरी थीं।

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