केवल इस तरह आप ईश्वर को देखने के साथ-साथ कर सकते हैं बात

राशि


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महेश भारद्वाज
जब विवेकानंद ने युवा नरेंद्र के रूप में स्वामी परमहंस से पूछा कि क्या आपने ईश्वर को देखा है तो उन्होंने उत्तर में बताया, ‘हां, ईश्वर को देखा भी है, उससे बात भी की है और तुम्हें भी दिखा सकता हूं।’ इस प्रसंग का उल्लेख करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अक्सर लोग इस तरह के सवाल करते रहते हैं, लेकिन जब सवाल स्वामी परमहंस सरीखे संतों से न करके सामान्य व्यक्ति से कर बैठेंगे तो जाहिर है, जवाब भी सामान्य या उलटे-पुलटे ही आएंगे और जिज्ञासा वहीं की वहीं खड़ी रह जाएगी। यहां सबसे पहले तो समझने की बात यह है कि क्या ईश्वर साक्षात्कार सांसारिकता का विषय है, अर्थात क्या सांसारिकता में लिप्त व्यक्ति के लिए ईश्वर को देख पाना संभव है? इस प्रश्न पर सांसारिक व्यक्तियों और संतों की अलग-अलग राय हो सकती है। व्यक्ति संत प्रवृत्ति की तरफ झुका होगा तो जवाब संतत्व लिए होगा और यदि सांसारिकता की तरफ झुका होगा तो जवाब उसी तरह से होगा।

अलग-अलग राय होते हुए भी इतना तो जरूर है कि बात ईश्वर को शारीरिक आंखों से देखने की हो रही है। मतलब साफ है कि यदि ईश्वर साक्षात्कार सांसारिकता का विषय है तो यह साक्षात्कार शारीरिक आंखों द्वारा भी किया जाना संभव है और यदि ऐसा संभव नहीं है तो फिर प्रश्न वही उठता है कि ईश्वर को आखिर कैसे और किन आंखों से देखा जा सकता है। वैसे तो ऐसे प्रश्नों का सटीक उत्तर परमहंस जैसे पहुंचे हुए संतों से ही मिल सकता है, लेकिन जब तक ऐसे गुरु सुलभ न हों तब तक हर सुधीजन को अपने स्तर पर भी इसका जवाब ढूंढने की कोशिश करते रहना चाहिए। ऐसी ही एक कोशिश बताती है कि ईश्वर दिव्य है और उसके दिव्य स्वरूप को देखने के लिए दिव्य दृष्टि का होना आवश्यक है, जो शारीरिक चक्षुओं से भिन्न है। इसलिए सबसे पहले तो दिव्य दृष्टि को जानने और पहचानने की जरूरत है।

दिव्य दृष्टि को जानने के लिए सर्वप्रथम अन्तर्मन को इस दिशा में लगाना होगा ताकि मानवीय शरीर में निहित आंतरिक चक्षुओं को जागृत किया जा सके या खोला जा सके। यह परम कार्य ईश्वर साधना के बिना संभव नहीं है। कुछ लोग इसे त्रिनेत्र खोलना भी कहते हैं तो कुछ इसे कुंडलिनी जागृत करने से भी जोड़कर देखते हैं। यहां ध्यान रखने की बात यह भी है कि ईश्वर साक्षात्कार से पहले व्यक्ति का पूर्णतया तैयार होना जरूरी है क्योंकि ईश्वर के दिव्य रूप से रूबरू होने से पहले मानवीय शरीर में उस उच्चतम कोटि की दिव्यता को सहन करने की क्षमता का विकास एकदम जरूरी है। अन्यथा बिना तैयारी के करंट छोड़ने की स्थिति में फ्यूज उड़ने जैसी स्थिति बनने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इसे देखते हुए जहां तक हो सके गुरु के मार्गदर्शन में ही ईश्वर दर्शन की कोशिश करना श्रेयस्कर है।

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