गली गुलियां

फ़िल्म रिव्यू

लीक से हटकर कुछ अलग ऐसे टॉपिक पर बनी फिल्में आपको पंसद आती है तो यकीनन यह फिल्म आपके लिए है। इस शुक्रवार को दीपेश जैन के निर्देशन में बनी ‘गली गुलियां‘ रिलीज़ हो रही है। चंद मेजर सेंटरों के जिन मल्टिप्लेक्सों में यह फिल्म रिलीज़ हो भी रही है तो यह इक्का-दुक्का स्क्रीन पर ही रिलीज होगी। जहां इस फिल्म को मेलबर्न फिल्म फेस्टिवल में अवॉर्ड भी मिल चुका है तो भी मेकर्स को अपनी इस फिल्म के लिए स्क्रीन तलाशने में काफी जोर लगाने के बाद भी चंद स्क्रीन ही मिल पाए।

स्टोरी प्लॉट : पुरानी दिल्ली की तंग गलियों के बीच एक छोटे से मकान में खुद्दूस (मनोज बाजपेयी) अकेले अपनी ही बसाई दुनिया में रहता है। खुद्दूस बिजली का अच्छा कारीगर है, लेकिन वह एक छोटे से कमरे में रहना पसंद करता है। इस अकेले में खुद्दूस का खास दोस्त और उसके पड़ोस में रहने वाला रणवीर शौरी ही उसका खास हमदर्द या साथी है जो उसके लिए लंच डिनर तक का इंतजाम करता है। खुद्दूस के पड़ोस में ही रहने वाला लियाकत (नीरज काबी) कसाई का काम करता है और अपनी खूबसूरत बीवी (सुहाना गोस्वामी) के साथ रहता है। लियाकत का बड़ा बेटा करीब 12 साल का है। लियाकत चाहता है कि उसका बेटा भी कसाई बने, इसीलिए वह उसे अपने साथ अपनी दुकान में बैठाता है। अक्सर लियाकत घर में उसे बुरी तरह से पीटता है, यह बात खुद्दूस को कतई पसंद नहीं। वैसे भी खुद्दूस ने अपनी गली के लगभग सभी मकानों में गुप्त कैमरे लगा रखे हैं जिनकी मदद से खुद्दूस अपने बंद कमरे में बैठकर यह देखता रहता है कि किस के घर में क्या हो रहा है और यह बात खुद्दूस के दोस्त को पंसद नहीं, लेकिन इसके बावजूद वह उसका हर मुश्किल में साथ देता है। खुद्दूस अब किसी तरह से लियाकत के घर तक पहुंचकर वहां भी अपना सीक्रेट कैमरा लगाना चाहता है, जिससे उसको पता चल सके कि वहां क्या हो रहा है। न चाहते हुए भी इस बार भी उसका साथ देता है। क्या खुद्दूस उस मासूम बच्चे को उस पर रोजाना हो रहे जुल्म से बचा पाता है, क्या वजह है कि खुद्दूस ने खुद को तंग गलियों के बीच बने एक छोटे से कमरे में कैद करके रखा हुआ है, अगर आप इन सवालों का जवाब चाहते हैं तो आपको ‘गली गुलियां’ देखनी होगी।

ऐक्टिंग और डायरेक्शन: तारीफ करनी होगी दीपेश जैन की, जिन्होंने एक अलग टाइप की बेहतरीन कहानी को शानदार ढंग से पेश किया है। फिल्म की कहानी आम मुंबइया फिल्मों से बिल्कुल डिफरेंट है। अंत तक दर्शक कुछ न कुछ जानने को बेताब रहते हैं, फिल्म का क्लाइमैक्स गजब का है। दीपेश ने कहानी के मुताबिक ही फिलम की लोकेशन का चयन किया है। यकीनन दीपेश ने दिल्ली की तंग गलियों और वहां रहने वालों की लाइफ को बेहतरीन ढंग से पेश किया है। सिनेमटॉग्रफी गजब की है। स्क्रीनप्ले दमदार है जो पूरी फिल्म को एक ही ट्रैक पर रखता है। तारीफ करनी होगी कि मनोज बाजपेयी ने जिन्होंने इस बार भी अपने किरदार को अपनी लाजवाब ऐक्टिंग से जीवंत कर दिखाया है, एक बेरहम पिता और कसाई के रोल में नीरज काबी ने अपने किरदार में जान डाली है। चाइल्ड आर्टिस्ट ओम सिंह अपने रोल में परफेक्ट लगे, अन्य कलाकारों में सुहाना गोस्वामी और रणवीर शौरी ने अपने रोल को ठीकठाक निभाया है।

क्यों देखें : पहली बात यह बॉलिवुड मसालों से भरी फिल्म नहीं है और यही वजह है कि फिल्म एक खास क्लास के लिए सटीक है। इनकी कसौटी पर फिल्म खरा उतरने का दम रखती है। अगर आप मनोज के फैन हैं तो इस फिल्म को एक बार जरूर देखें।

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