डॉक्टर बनना चाहती थी यह महान महिला, दुर्घटना के बाद बन गई पेंटर

राशि


frida-kahlo

संकलन: रेनू सैनी
छह वर्ष की बच्ची फ्रीडा पोलियो से ग्रस्त थी। उसकी उम्र के सभी साथी उसे अकेला छोड़ देते थे। वह खेलने के लिए जब भी अपना पैर बढ़ाती तो नीचे गिर जाती। उसने अपना ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित किया। पढ़ने में उसे कोई दिक्कत नहीं होती थी। उसके टैलंट की सभी तारीफ करने लगे। उसने सोचा, वह बड़ी होकर डॉक्टर बनेगी। लेकिन एक दिन जब वह स्कूल से घर आ रही थी, भीषण सड़क दुर्घटना का शिकार हो गई। उसकी पसलियां, दोनों पैर और कॉलरबोन टूट चुके थे।

कई महीनों तक असाध्य पीड़ा झेलकर वह किसी तरह सांसें ले पा रही थी। लेकिन वह अपना जीवन यूं जाया नहीं करना चाहती थी। डॉक्टर तो अब वह बन नहीं सकती थी। क्या करे। उसे पेटिंग का भी शौक था। अब फ्रीडा ने पेटिंग में अपना भविष्य बनाने की ठान ली। इसके लिए उसने विशेष रूप से बनाए गए ईजल को बिस्तर के पास रखा, और उसके ऊपर एक दर्पण रख कर पेटिंग करनी आरंभ कर दी। जब भी वह टूटने लगती तो दर्पण में अपनी छवि को निहारती और स्वयं को मजबूत करके फिर पेटिंग बनाने में लग जाती।

प्रारंभ में उसने अपनी बहनों और मित्रों के चित्र बनाए। इसके बाद उसकी कल्पना विस्तार लेती गई और वह आश्चर्यजनक चित्र बनाने लगी। धीरे-धीरे उसकी ख्याति दूर तक फैलती गई। इतना ही नहीं, उसकी पेटिंग को पेरिस अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय के लिए खरीदा गया। जब उसकी पेटिंग अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय में रखी गई तो वह बीसवीं सदी की पहली मैक्सिकन पेंटर थी जिसे यह सम्मान प्राप्त हुआ था। उसे दुनिया विख्यात चित्रकार फ्रीडा काहलो के रूप में जानती है। उन्होंने अपने शरीर की बुरी तरह टूट-फूट के बावजूद अपने संकल्प के सहारे शोहरत और सम्मान अर्जित करके साबित किया कि व्यक्ति तब तक नहीं टूट सकता जब तक वह स्वयं टूटना न चाहे।

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