जब तक आप इन बंधनों को नहीं जानेंगे तब मुक्ति कहां?

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जब तक आप इन बंधनों को नहीं जानेंगे तब मुक्ति कहां?

सुरक्षित गोस्वामी
मुक्ति के लिए पहले अपने बंधन को समझना होगा। बंधन का मतलब है, संसार की तरफ हमारा आसक्त रहना। इसके लिए देखना होगा कि हमारा मन, बुद्धि, अहंकार और हमारी इंद्रियां बार-बार कहां जाकर अटक जाती हैं। इंद्रियों को अपने कौन-कौन से विषय प्रिय हैं, मन किन-किन खयालों में खोया रहता है और अहंकार किस प्रकार मैं, मेरा और मेरे वालों में उलझा रहता है। इन्हीं कारणों से चित्त में संस्कार इकट्ठा होते हैं। जब तक हम अपने इन बंधनों को नहीं जानेंगे और उनसे अपने को अलग नहीं करेंगे, तब तक मुक्ति कहां?

आत्मा कभी भी मुक्त नहीं हो सकती, क्योंकि वह कभी बंधन में आई ही नहीं। बंधन तो चित्त का होता है, इसलिए मुक्ति भी चित्त की ही हो सकती है। चित्त इसलिए बंधन में आता है, क्योंकि यह संस्कारों, वासनाओं और इच्छाओं से भर जाता है। जब तक चित्त साफ न हो जाए, उसका बंधन बना ही रहता है। चित्त ऐसे ही है जैसे आईना! हमें अपने ही चेहरे को देखने के लिए आईने की जरूरत होती है और यदि आईना ही धूल से भरा हो तो चेहरा देखना मुश्किल होता है। इसके लिए आईने को साफ करना जरूरी है। ऐसे ही अपनी ही आत्मा का साक्षात्कार करने के लिए हमें चित्त रूपी आईने की जरूरत होती है। इसलिए चित्त को साफ करना आवश्यक है।

हमारे चित्त में अनेक जन्मों के कर्मों के फल भरे पड़े हैं। इसकी सफाई के लिए हमें अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को याद करना होगा और उसी भाव में बने रहना होगा। इस प्रक्रिया को ज्ञान योग कहते हैं। ऐसा करने से चित्त के संस्कार स्वाहा हो जाते हैं। फिर जो कुछ कर्मों के फल इस जन्म में भोगने के लिए मिले थे, उन्हें प्रभु की कृपा समझकर शुक्रिया भाव से भोग लेना होगा, इसे भक्तियोग कहते हैं। फिर जो दिनचर्या में कर्म कर रहे हैं, उन कर्मों को प्रेम, आनंद और खुशी के साथ किया जाए। ऐसा करने से नए कर्म नहीं बनेंगे, यह कर्मयोग है। इस प्रकार हम संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण तीनों कर्मों से ऊपर उठ जाते हैं। इसी को मुक्ति कहते हैं।

ऐसा नहीं है कि हम मरने के बाद मुक्त होंगे। यदि अभी मुक्ति का भाव नहीं है तो मरने के बाद मुक्त हो ही नहीं सकते। जब हम किसी भी कर्म को करने से पहले, कर्म करते हुए और कर्म करने के बाद एक जैसे आनंद के भाव में बने रहते हैं, सबके लिए हमारे भीतर समता और प्रेम का भाव होता है तो हम अभी मुक्त ही हैं। व्यक्ति सोचता है कि जीते जी तो अनेक समस्याएं हैं! चलो, कुछ धार्मिक अनुष्ठान करो, जिससे मरने के बाद मुक्त हों जाएं। ऐसे मुक्ति नहीं होती। मुक्ति के लिए हर समय मुक्ति के ही भाव में रहना होता है, फिर आप मुक्त ही हैं।

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