करुणा: विरासत संभालने को कितना तैयार स्टालिन

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फाइल फोटो: एम करुणानिधि और एमके स्‍टालिन

चेन्‍नै

तमिलनाडु के मुख्‍य विपक्षी दल डीएमके के अध्‍यक्ष एम करुणानिधि का मंगलवार देर शाम को चेन्‍नै के कावेरी हॉस्पिटल में निधन हो गया। करीब छह दशक तक द्रविड़ राजनीति के केंद्र बिंदु रहे इस दिग्‍गज नेता के निधन के साथ ही एक युग का अंत हो गया। माना जा रहा है कि करुणानिधि के निधन के बाद अब पार्टी के कार्यकारी अध्‍यक्ष एमके स्‍टालिन को अध्‍यक्ष बनाया जाएगा। पहले जयललिता और अब करुणानिधि के जाने के बाद तमिलनाडु की राजनीति में आए इस खालीपन को स्‍टालिन कितना भर पाएंगे, यह यक्ष प्रश्‍न बना हुआ है।

राजनीतिक विश्‍लेषकों के मुताबिक स्‍टालिन के लिए पिता की विरासत को सहेजे रखना बेहद मुश्किल होगा। खासकर तब जब तमिल सिनेमा के दो दिग्‍गज रजनीकांत और कमल हासन राज्‍य की राजनीति में कदम रख चुके हैं। राजनीतिक विश्‍लेषक और वरिष्‍ठ पत्रकार मालन वी नारायणनन कहते हैं, ‘इस खालीपन को भरने के लिए स्‍टालिन सही व्‍यक्ति नहीं हैं लेकिन उनका कोई विकल्‍प नहीं है।’

नरायनन ने कहा, ‘स्‍टालिन को पसंद करने और उनसे घृणा करने का कोई कारण नहीं है। हालांकि पार्टी पर उनकी पूरी पकड़ है।’ उधर, कई ऐसे भी लोग हैं जिनका मानना है कि करुणानिधि की विरासत को स्‍टालिन आगे बढ़ा सकते हैं। डीएमके के नेता भी स्‍टालिन को अपने लीडर के रूप में स्‍वीकार कर चुके हैं।

स्‍टालिन के पक्ष में तर्क

इस तर्क के पक्ष में वे कहते हैं कि एक समय में करुणानिधि के उत्‍तराधिकारी कहे जाने वाले स्‍टालिन के भाई एमके अलागिरी साइड लाइन हो चुके हैं। यही नहीं 2जी मामले में आरोपी रहीं उनकी चचेरी बहन कनिमोई कभी भी गंभीर उत्‍तराधिकारी नहीं रहीं। जयललिता और करुणानिधि के निधन के बाद अब तमिलनाडु की राजनीति में वह सबसे अनुभवी नेता हैं। उनकी मुख्‍य विपक्षी पार्टी और राज्‍य में सत्‍तारूढ़ एआईएडीएमके में बिखराव चल रहा है।

स्‍टालिन को एक विधायक, चेन्‍नै के मेयर और पार्टी संगठन का वृहद अनुभव है। राज्‍य में उनकी छवि भी बहुत साफ सुथरी है। अन्‍य नेताओं जैसे विजयकांत और अंबूमणि रामदास इतने लोकप्रिय नहीं हैं कि वे स्‍टालिन के लिए खतरा बन सकें। वहीं तमिल राजनीति में कदम रख चुके सुपरस्‍टार रजनीकांत और कमल हासन को अभी अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करनी बाकी है।

स्‍टालिन के विपक्ष में तर्क

विश्‍लेषकों का मानना है कि करुणानिधि और जयललिता की तरह स्‍टालिन करिश्‍माई नेता नहीं हैं। अपने पिता के विपरीत स्‍टालिन अच्‍छे वक्‍ता भी नहीं हैं। करुणानिधि भी शुरू में उन्‍हें अपना उत्‍तराधिकारी बनाने को लेकर बहुत उत्‍सुक नहीं थे। करीब 33 साल तक पार्टी के छात्र संगठन की कमान संभालने के बाद उन्‍हें पिछले साल डीएमके का कार्यकारी अध्‍यक्ष बनाया गया था।

यही नहीं जलीकट्टू और हाइड्रोकार्बन प्रॉजेक्‍ट को लेकर राज्‍यभर में जनता ने आंदोलन किया लेकिन स्‍टालिन इसका राजनीतिक फायदा नहीं उठा पाए। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में स्‍टालिन ने चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी लेकिन वह कुछ खास नहीं कर पाए और उनकी पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। माना जा रहा था कि अगर इस चुनाव में डीएमके को जीत मिलती तो उन्‍हें सीएम भी बनाया जा सकता था। हालांकि पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इससे स्‍टालिन के एक जननेता के रूप में उनकी छवि को झटका लगा।

चुनावी जंग को जीतना होगा मुश्किल

नारायनन का मानना है कि स्‍टालिन एक जेंटलमैन राजनेता हैं और वह ऐसी प्रतिक्रिया देते हैं जो प्रोऐक्टिव नहीं होती हैं। विश्‍लेषक मानते हैं कि यह स्‍टालिन के लिए तमिलनाडु की राजनीति में छाप छोड़ने के लिए एक शानदार मौका है। वह पार्टी में अपने विरोधियों को पीछे छोड़ते हुए करुणानिधि के उत्‍तराधिकारी बनकर उभरे हैं लेकिन चुनावी अखाड़ा इससे अलग है। वह एक अनुभवी नेता हैं लेकिन अपने पिता की अनुपस्थिति में आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करना उनके लिए बहुत मुश्किल होगा।

karunanidhi passes away know all about him

…और ‘राजकुमारी’ के बाद करुणानिधि ने पीछे मुड़कर नहीं देखा
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