पढ़ें, चुनाव से पहले फिर पलटी मारेंगे CM नीतीश!

विचार

बिहार में चुनावी सुगबुगाहट शुरू हो गई है। अंदरखाने सभी पार्टियां चुनावी तैयारी में जुट गई हैं। बीजेपी अगले सप्ताह केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की एक वर्चुअल रैली भी करने जा रही है। यह बिहार में अपने तरह की पहली रैली होगी। उसकी तैयारियां जोरो-शोरों से चल रही है। दूसरी तरफ आरजेडी ने चुनाव नजदीक देखते अपने कोर वोटरों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया है। वहीं निर्वाचन आयोग ने भी धीरे-धीरे ही सही लेकिन अपनी तैयारी शुरू कर दी है।

लेकिन, वास्तव में चुनाव अगस्त-सितंबर में होने वाले कोरोना के कहर से पर निर्भर है। अगर देश के साथ-साथ बिहार में कोरोना का संक्रमण बढ़ा तो चुनाव टल सकता है। एक्सपर्ट कह भी रहे हैं कि जुलाई-अगस्त में महामारी भयंकर रूप दिखा सकती है। ऐसे में दो विकल्प हैं। पहला, बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाए या दूसरा, कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार को रखते हुए सरकार को 6 महीने का एक्सटेंशन मिल जाए। ये दोनों ऑप्शन केंद्र सरकार के हाथ में हैं। वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए बीजेपी के लिए पहला विकल्प ही बेहतर रहेगा।

No jungle raj by Lalu Yadav-Nitish Kumarयह सब चीजें तो कोरोना के कहर पर निर्भर करेंगी, लेकिन नीतीश के मन में जो अंदरखाने सुगबुगाहट चल रही है, उसे समझने की जरूरत है। करीब 15 सालों नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं। कभी आरजेडी के साथ तो कभी बीजेपी के साथ वह मुख्यमंत्री के पद पर काबिज हैं। लेकिन, अब स्थितियां बदली हुई नजर आ रही हैं। प्रदेश में नीतीश को लेकर जबरदस्त नाराजगी है। वैसे तो नाराजगी सरकार से है, लेकिन सरकार के मुखिया होने के नाते लोगों का सारा गुस्सा नीतीश पर है। बीजेपी के प्रति गुस्सा कम है।

2014 और 2019 के आम चुनाव की तुलना में 2024 के चुनाव का माहौल भी बदला हुआ नजर आ रहा है। केंद्र की राजनीति में नीतीश प्रभावी ढंग से अपनी मौजूदगी चाह रहे हैं। नीतीश का यह सपना भी रहा है। उन्हें अपने सपने को पूरा करने का माहौल भी बनता दिखाई दे रहा है। गैरबीजेपी खेमे में कांग्रेस की कमजोरी का फायदा उठाने की फिराक में नीतीश कुमार दिख भी रहे हैं।

Fact check: 2015 photo of Narendra Modi, Nitish Kumar shared with ...सूत्रों की मानें तो नीतीश के विश्वस्त विपक्षी खेमे में उनकी भूमिका के लिए जगह बनाने के काम में लग गए हैं। नीतीश को लगता है कि ऐसी स्थिति में एक गैरबीजेपी गठबंधन बनता है तो उन्हें नेता के रूप में स्वीकार्य किया जा सकता है। अन्य क्षेत्रीय दलों के नेता की तुलना में उनकी साफ-सुथरी छवि इसमें मददगार साबित हो सकती है। साथ ही जाति इस देश की राजनीति के केंद्र में है और पिछड़ा होने के नाते नीतीश भी उस गणित में फिट बैठते हैं। खासकर मध्य और उत्तर भारत की राजनीति के लिए तो वह बिल्कुल फिट हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछड़ा काट को अगर कोई काट सकता है तो वह हैं नीतीश हैं।

Bihar Polls: RJD's Lalu Prasad Yadav & JD(U)'s Nitish Kumar come ...फिर दिक्कत कहां है?
अब सवाल उठता है कि इतने समीकरण बन रहे हैं तो दिक्कत कहां है। वास्तव में दिक्कत खुद नीतीश कुमार हैं। वह जानते हैं कि 2024 के चुनाव में अभी समय है। वह चाहते हैं कि विपक्षी खेमा केंद्र में मुझे पीएम का चेहरा तो बनाए ही, साथ ही राज्य में भी तब तक मुख्यमंत्री मुझे ही रहने दे। नीतीश का यह शर्त राजद के नए नेतृत्व तेजस्वी यादव को स्वीकार नहीं है। राजद का कहना है कि वह नीतीश को केंद्र में नेता मानने को तैयार हो सकते हैं लेकिन उन्हें बिहार में अपनी दावेदारी छोड़नी होगी। तेजस्वी चाहते हैं कि नीतीश और उनकी पार्टी बिहार में नंबर दो की भूमिका में आए। यही बात सबसे बड़ी बाधा बन रही है।

नीतीश को यह स्वीकार नहीं है। वह जानते हैं कि राजद को पता है कि वह अकेले बिहार में सत्ता हासिल नहीं कर सकता है। राजद को हर कीमत पर सत्ता के लिए जेडीयू की जरूरत है। नीतीश को लगता है कि आरजेडी उनकी ताकत बन जाएगी और अंत में तेजस्वी उन्हें केंद्र और राज्य, दोनों जगह नेता मानने को मजबूर हो जाएंगे।

अब देखना है कि चुनाव से पहले इस बार नीतीश पलटी मारते हैं या नहीं?

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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