फ़िल्म रिव्यू

रेणुका व्यवहारेकहानी: सूर्या (अभिमन्यु दासानी) को एक दुर्लभ सुपरहीरो की बीमारी है, जिसकी वजह से उसे दर्द का भी एहसास नहीं होता। इस बीमारी की वजह से उसे सोसाइटी में कहीं भी फिट नहीं माना जाता। वह यह सोचकर बड़ा होता है कि वह एक कराटेमैन है और उसे समाज के गलत लड़कों को सबक
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रचित गुप्ता‘केसरी’ कहानी है साल 1897 में हुई सारागढ़ी की लड़ाई की जहां केवल 21 सिख सैनिकों ने 10,000 अफगानों की फौज का डटकर सामना किया था। इस लड़ाई को मानवीय इतिहास की सबसे ज्यादा बहादुरी से लड़ी गई लड़ाइयों में से एक माना जाता है। आज भी केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया
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सेल्फी और इंस्टाग्राम के चट क्लिक, पट अपडेट के इस दौर में कभी दराज में पड़ी एक पुरानी फोटो हाथ लग जाए, तो आंखों में चमक और चेहरे पर मुस्कान आए बिना रह ही नहीं सकती। निर्देशक रितेश बत्रा ने अपनी ताजातरीन फिल्म फोटोग्राफ से दर्शकों की आंखों में वही चमक और चेहरे पर वही
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आपने जब ‘हासिल’, ‘पान सिंह तोमर’ और ‘साहब बीवी और गैंग्सटर’ जैसी अर्थपूर्ण फिल्में बनाई हों तो आपसे उम्मीदों और अपेक्षाओं का होना तो बनता है, मगर आप रोमांटिक ड्रामा को चटपटा बनाने के चक्कर में उसमें इतने मसाले डाल देते हैं कि जायका बिगड़ जाता है। हम बात कर रहे हैं, तिग्मांशु धूलिया की
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कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में क्रिटिकली अक्लेम्ड ‘हामिद’ को देखते हुए दर्शक को समझना होगा कि यह आम बॉलिवुड मसाला फिल्म नहीं है, मगर जब आप इस फिल्म को देखना शुरू करते हैं, तो अल्लाह और कश्मीर के मुद्दों पर सात साल के मासूम बच्चे हामिद के सवाल आपको विचलित करते हैं और प्री क्लाइमेक्स
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‘द्रौपदी ने कहा है बदला हमेशा सही नहीं होता, मगर माफ करना भी हमेशा सही होता’, फिल्म के इसी डायलॉग के इर्दगिर्द घूमती है निर्देशक सुजॉय घोष की ‘बदला’। सुजॉय की यह सस्पेंस थ्रिलर स्पेनिश फिल्म ‘द इनविजिबल गेस्ट’ की ऑफिशल रीमेक है। जिन लोगों ने मूल फिल्म नहीं देखी, उन्हें इसका सस्पेंस, थ्रिल और
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मार्वल सिनमैटिक यूनिवर्स की पहली फीमेल सुपरहीरो वाली फिल्म कैप्टन मार्वल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सिनेमाघरों में दस्तक देने को तैयार है। आइरनमैन, थॉर, हल्क, ब्लैक पैंथर जैसे सुपरहीरोज रचने वाले मार्वल स्टूडियोज की इस 21वीं फिल्म में पहली बार फीमेल सुपरहीरो केंद्र में है। यूं तो स्टूडियो ने एक फीमेल सुपरहीरो गढ़ने में करीब
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लिव इन रिलेशनशिप को हमारे कानून ने भले ही मान्यता दे दी हो, मगर आज भी समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग उसे अच्छी निगाह से नहीं देखता। उनके लिए शादी का पवित्र बंधन ही सर्वोपरि है, जबकि आज का यूथ अपने पार्टनर के मामले में अंधा फैसला करने के मूड में नहीं है। वह
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रेणुका व्यवहारेआप लोगों से भाग सकते हैं लेकिन खुद से कैसे भागेंगे? आप दूसरों का मुंह बंद कर सकते हैं लेकिन अपनी अंतरात्मा की आवाज कैसे बंद करेंगे? बीहड़ के परिपेक्ष्य में सोनचिड़िया अफसोस और मुक्ति की कहानी है। ऐक्टर्स की परफॉर्मेंस और जबरदस्त सिनेमटॉग्रफी इस कहानी को और भी जबरदस्त बना देती है। अभिषेक
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अगर आप फैमिली के साथ इस वीकेंड मस्ती और टाइम पास करने के लिए पर मूवी देखने की प्लानिंग कर रहे हैं तो ‘टोटल धमाल‘ आपके लिए है। इस सीरीज़ की पिछली दो फिल्मों के प्रडयूसर इंद्र कुमार अपनी इस फिल्म में लीड किरदार के लिए ऐक्टर अजय देवगन को साइन करने गए तो उन्हें
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एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते, दोस्ती में नो सॉरी नो थैंक यू, डायरेक्टर सूरज बड़जात्या ने अपनी पहली फिल्म मैंने प्यार किया में दोस्ती और प्यार के ऐसे कई फलसफे गढ़े थे, जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। वही, सूरज बड़जात्या अब प्रड्यूसर के तौर पर दोस्ती की नई
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रचित गुप्ताफिल्म की कहानी मुंबई के धारावी की एक चॉल से शुरू होती है। मुराद (रणवीर सिंह) गरीबी और सामाजिक बहिष्कार से जूझता एक मुंबई का युवा है जिसका सपना एक बड़ा रैपर बनने का है। मुराद, एक जिंदादिल लड़की सैफीना (आलिया भट्ट) से प्यार करता है। मुराद की जिंदगी में बदलाव तब आता है
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एक प्रेमी जोड़ा एकांत में बसे अपने महलनुमा घर में कुछ यादगार पल बिताने पहुंचता है। वहां, उनमें से किसी एक के अतीत से जुड़ी बुरी आत्मा का साया उनकी जिंदगी उथल-पुथल कर देता है, बॉलिवुड में इस विषय पर बहुत सारी हॉरर फिल्में बनी हैं। डायरेक्टर भूषण पटेल की फिल्म अमावस इसी कड़ी का
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हरियाणवी सिंगर, डांसर और ‘बिग बॉस’ की लोकप्रिय कंटेस्टेंट रहीं सपना चौधरी की शोहरत को भुनाने के लिए निर्देशक हादी अली अबरार ने दोस्ती के साइड इफेक्ट्स बना तो डाली, मगर दिक्कत यह हुई कि सपना को कॉलेज स्टूडेंट, डांसर, पुलिसवाली जैसे हर रूप में फिट करने के चक्कर में कहानी में इतने टर्न और
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निर्देशक वी शक्ति के ने अपनी फिल्म ‘झोल’ में हीरो को पैसे कमाने के लिए झोल करते हुए दिखाया है। ऐसी कहानियां हम पहले भी कई बार देख चुके हैं, मगर निर्देशक ने अपनी कहानी में इतना झोल कर दिया कि फिल्म देखने लायक नहीं रही। आज जब टीवी सीरियल्स से लेकर ऑनलाइन कॉन्टेंट इतना
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तकरीबन 10 साल लगे निर्देशक आनंद सुरापुर की फिल्म ‘द फकीर ऑफ वेनिस’ को सिनेमा हॉल तक पहुंचने में, मगर फिल्म देखते हुए आप कहानी से ऐसे जुड़ जाते हैं कि आपको यह एहसास नहीं होता कि आप सालों से लटकी हुई किसी फिल्म को देख रहे हैं। यह सच है कि यह कोई कमर्शल
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