येल यूनिवर्सिटी के म्यूज़ियम में कैसे पहुँची बिहार से सूर्य की कलाकृति 

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नई दिल्ली: इतिहासकार रोहित डे मुझे येल यूनिवर्सिटी के ब्रिटिश आर्ट सेंटर ले गए. मुझे एक ख़ास कलाकृति के पास ले गए और कहा कि ये आपके बिहार के सूर्य देव हैं. मैं तो देखते ही रोमांचित हो उठा। यक़ीन नहीं हुआ कि क्या देख रहा हूँ. पटना म्यूज़ियम में काफ़ी वक़्त गुज़ारा है. एक समय तक यहाँ के किस कमरे में कौन सी मूर्ति रखी होती थी, मुझे याद रहता था. अब भूल गया हूँ. बिहार के सूर्य देव की प्रतिमा कैसे आई, इसका विवरण नहीं मिला. यहाँ रखी कई प्रतिमाएँ नीलामी में ख़रीदी गईं हैं या किसी के दान के ज़रिए यहाँ पहुँची है. कुछ भी आधिकारिक टिप्पणी करने से पहले इसके बारे में विस्तार से जानना ज़रूरी है. प्रयास कर रहा हूँ. पर बिहार में ग्यारहवीं सदी में शिल्पकार सूर्य की प्रतिमा रहे थे, यह सोच कर मन उत्साहित हो गया. यह जानना चाहता हूँ कि ऐसी कितनी प्रतिमाएं  बनी होंगी. क्या ग्यारहवाँ सदी को पहले से भी सूर्य की प्रतिमा रही थी? उस वक़्त क्या संदर्भ रहा होगा ? क्या इसका छठ से संबंध रहा होगा? बिना जाने कुछ भी कहना सही नहीं होगा क्योंकि म्यूज़ियम के डिटेल में दो बातें बहुत अहम लिखी हैं. यह कलाकृति पाल वंश के समय की है. पाल वंश का राज बंगाल-बिहार के इलाक़े में था मगर यहाँ बिहार प्रांत लिखा हुआ है.

पाल वंश का संबंध बौद्ध धर्म के महायान परंपरा से था. म्यूज़ियम की सूचना पट्टिका में लिखा हुआ है कि सूर्य बौद्ध और हिन्दू परंपराओं में मौजूद रहे हैं। क्या छठ का संबंध बौद्ध परंपराओं से रहा होगा? जिस तरह से छठ में पुजारी की भूमिका नगण्य है, उससे यह मुमकिन लगता है. क्या छठ बौद्ध परंपरा है जिसे बाद में सबने अपनाया. मेरी यह टिप्पणी बिना इतिहास के संदर्भों से मिलान किए हुए है, इसलिए कुछ भी आधिकारिक नज़रिए से नहीं कह रहा. सूर्य का मुखड़ा बौद्ध प्रतिमाओं के चेहरे से मिलता लगता है. अब आते हैं कलाकृति पर. सूर्य रथ पर सवार हैं. मध्य में सबसे बड़े सूर्य हैं. उनके पाँव के नीचे उमा की मूर्ति हैं जिन्हें प्रभात की देवी कहा गया है. मगर उमा का स्थान पाँव के बीच में हैं. सूर्य को स्वर्ग की देवी के बारह संतानों में से एक माना जाता है. इन संतानों को आदित्य कहते हैं.

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सूर्य इनमें से एक हैं. इस मूर्ति में बीच में सूर्य हैं. बाक़ी ग्यारह आदित्य किनारे बने हैं. जिनका पेट निकला है और दाढ़ी है उन्हें पिंगला बताया गया है. दायीं ओर द्वारपाल हैं. बिहार में छठ के समय सूर्य की मूर्ति बनती है. देखना होगा कि उन मूर्तियों के कौन कौन से तत्व ग्यारहवाँ सदी की कलाकृति से मेल खाते हैं. बिहार में जो मूर्ति बनती है, उसमें सूर्य को जूता पहने दिखाया जाता है. ईरानी परंपरा से यह बात आई होगी. प्राचीन की प्रतिमाओं में ईष्ट जूता पहना करते थे. कभी किसी ने यह बात कही थी मगर वे इतिहासकार नहीं थे. अंतिम राय बनाने से पहले पुख़्ता प्रमाण ज़रूरी होते हैं।.रवीश कुमार ने सिर्फ एक टिप्पणी की है. यह कलाकृति बहुत ख़ूबसूरत है. देर तक निहारने का मन करता है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इसके बारे में और पता करना चाहिए और कोशिश करनी चाहिये कि यह मूर्ति पटना के म्यूज़ियम में हो. इसे लेकर भावुक और फ़ालतू राजनीति नहीं हो मगर इसकी जानकारी भी पटना के म्यूज़ियम में उपलब्ध हो सके तो अच्छा रहेगा. अगर येल यूनिवर्सिटी ख़ुशी खशी दे तो भी या फिर इसके लिए पैसे की कोई सीमा नहीं रखनी चाहिए. यह कलाकृति शानदार है. बिहार की जनता को देखने का मौक़ा मिले, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है. बिहार के लोगों को छठ पर यह विशेष तोहफ़ा दे रहा हूँ. ग्याहरवाँ सदी में बनी सूर्य की कलाकृति को निहारिये और ख़ुश रहिए. छठ की शुभकामनाएँ. 

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