अन्नकूट आज: 56 भोग से कढ़ी चावल तक, जानें खास बातें

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दिवाली के अगले दिन हर साल गोवर्धन पूजा की जाती है। इस पर्व को देश के अलग-अलग राज्यों में कई तरीकों से मनाया जाता है। कहीं-कहीं गोवर्धन को अन्नकूट पर्व भी कहा जाता है। राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में कोई 56 भोग बनाकर इस उत्सव को मनाता है तो कई जगह इस दिन कढ़ी-चावल से श्रीकृष्ण को भोग लगाया जाता है। वहीं, दक्षिणी भारत के हिस्सों में इस दिन राजा बलि की पूजा का विधान है। इस साल यह पर्व 8 नवंबर को है। आइए, जानते हैं इस पर्व के महत्व को…

हर साल इसलिए मनाया जाता है गोवर्धन पर्व

हर साल कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन उत्सव मनाए जाने का विधान है। इस दिन राजा बलि, अन्नकूट, मार्गपाली आदि उत्सव भी मनाएं जाते हैं। दरअसल, अन्नकूट या गोवर्धन पूजा मनाने की प्रथा की शुरुआत भगवान कृष्ण के अवतार के बाद से द्वापर युग से हुई। इस दिन आप गाय, बैल आदि पशुओं का धूप, चंदन और फूल माला आदि से पूजन कर सकते हैं। इस दिन गौमाता की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना और उनकी आरती उतारकर प्रदक्षिणा लगाई जाती है।

जरूर करनी चाहिए इनकी पूजा

दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। कई जगह लोग इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। दरअसल गोवर्धन पूजा में गौधन यानी गायों की पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी माना गया है। इसकी वजह है जैसे देवी लक्ष्मी सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं, उसी तरह गौमाता भी हमें स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। इस कारण लोग गौमाता के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए गोर्वधन पूजा में प्रतीक स्वरूप गाय की पूजा करते हैं।

यह भी है परंपरा

दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर समूचे उत्तर भारत में गोवर्धन पर्व बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन हिंदू धर्मावलंबी घर के आंगन में गाय के गोबर से पर्वत बनाकर पूजा करते हैं। वहीं कुछ जगह गोवर्धन नाथ जी की प्रतिमूर्ति बनाकर, उसका पूजन करने का भी विधान है। इसके बाद ब्रज के साक्षात देवता माने जाने वाले गिरिराज भगवान को प्रसन्न करने के लिए उन्हें अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।

ऐसे करें गोवर्धन पूजा

कई जगह गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर जल, मौली, रोली, चावल, फूल, दही तथा तेल का दीपक जलाकर पूजा करते हैं और फिर उसकी परिक्रमा लगाते हैं। वहीं इस दिन भगवान गोवर्धन के लिए भोग व नैवेद्य में नित्य के नियमित पद्धार्थ के अलावा यथाशक्ति अन्न से बने कच्चे-पक्के भोग, फल, फूल के साथ छप्पन भोग लगाया जाता है। दरअसल ‘छप्पन भोग’ बनाकर भगवान को अर्पण करने का विधान भागवत में बताया गया है। इसके बाद फिर सभी सामग्री को अपने परिवार, मित्रों में प्रसाद स्वरूप बांटकर ग्रहण करते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने बंद कराई पूजा

शास्त्रों के अनुसार गोवर्धन पूजा की परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है। उससे पूर्व ब्रज में इंद्र की पूजा की जाती थी। मगर जब भगवान कृष्ण ने गोकुल वासियों को तर्क दिया कि इंद्र से हमें कोई लाभ नहीं प्राप्त होता क्योंकि वर्षा कराना तो उनका धर्म है और वह सिर्फ अपना कार्य करते हैं। इसकी जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, जो हमारे गौधन का संवर्धन एवं संरक्षण करता है, जिससे हमारा पर्यावरण भी शुद्ध बनता है। इसलिए इंद्र की नहीं गोवर्धन की पूजा की जानी चाहिए।

और गोवर्धन ने ले ली इंद्र की जगह

अपने प्रति इस उल्लेख को जानकर इंद्र काफी रुष्ट हो गए और उन्होंने अपना ब्रजवासियों में फिर वर्चस्व स्थापित करने के लिए भारी वर्षा से सभी को डराने का प्रयास किया। मगर इंद्र के इस प्रकोप से बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाकर, सभी गोकुलवासियों को बचा लिया। इस तरह से ही इंद्र भगवान की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का विधान शुरू हुआ और जो परंपरा आज भी जारी है।

जब कान्हा ने झुका दिया था इंद्र को

कथा के अनुसार सभी ब्रजवासी सात दिन तक गोवर्धन पर्वत की शरण में रहे। वहीं भगवान कृष्ण के सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर एक भी जल की बूँद नहीं पड़ी। इसके पश्चात ब्रह्मा जी ने इन्द्र को समझाया कि पृथ्वी पर श्रीकृष्ण ने जन्म ले लिया है और उनसे तुम्हारा वैर लेना उचित नहीं। तभी श्रीकृष्ण अवतार की बात जानकर इंद्रदेव अपनी मुर्खता पर बहुत लज्जित हुए और भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा याचना की। जिसके बाद श्रीकृष्ण ने सातवें दिन गोवर्धन पर्वत को नीचे रखकर ब्रजवासियों को उपदेश दिया कि अब से प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व पूरे उल्लास के साथ मनाया जाएगा।

श्रीहरि को प्यारा है यह पर्वत

इसके अलावा बल्लभ संप्रदाय के उपास्य देव श्रीनाथ जी की जन्मस्थली होने के कारण इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। इस बारे में गर्ग संहिता में इसके महत्व का कथन करते हुए कहा गया है, ‘गोवर्धन, पर्वतों का राजा और हरि का प्यारा है। इसके समान पृथ्वी और स्वर्ग में कोई दूसरा तीर्थ नहीं है।’ हालांकि आज इसका आकार-प्रकार और प्राकृतिक सौंदर्य पूर्व की अपेक्षा क्षीण हो गया है, फिर भी इसका महत्व कदापि कम नहीं हुआ है।

ऐसी है पौराणिक मान्यताएं

ऐसी मान्यता है कि यदि आज के दिन कोई दुखी है तो सालभर वह दुखी रहेगा, इसलिए इस दिन सभी को प्रसन्न मन से इस उत्सव को संपूर्ण भक्ति भाव से मनाना चाहिए। इस दिन तेल लगाकर स्नान करने को अनिवार्य माना गया है। इससे आयु, आरोग्य की प्राप्ति होती है और दुख-दरिद्रता का नाश होता है। इस दिन जो पवित्र भाव से भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण का ध्यान पूजन करता है वह सालभर के लिए सुखी व समृद्ध बना रहता है।

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