आर्मी जवान लगातार मेरे ब्रेस्ट घूर रहा था: विद्या बालन

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अभिनय का पावर हाउस कही जाने वाली विद्या बालन ने भूमिकाओं के मामले में हमेशा से अलग राह चुनी। कुछ अरसे से बॉक्स ऑफिस पर उनकी फिल्में भले ही कमाल न दिखा सकी हों, मगर विद्या का अभिनय हमेशा कुंदन की तरह चमका है। इन दिनों वह चर्चा में हैं, अपनी ताजा-तरीन फिल्म ‘तुम्हारी सुलु’ से। इस खास मुलाकात में उन्होंने यौन शोषण, हाउसवाइफ, अपनी नाकामियों, अपने पति, शादी और मदरहुड की बातें खुलकर कीं।

आपने फिल्मों में हमेशा से मजबूत औरतों का प्रतिनिधित्व किया है। हाल ही में यौन शोषण को लेकर हुए कैंपेन #MeToo के तहत आम ही नहीं जानी-मानी हस्तियों ने अपने अनुभव बांटे। आप क्या कहना चाहती हैं?

यौन शोषण हमेशा से होता रहा है। अंतर यह है कि आज लोग इस मुद्दे पर बात कर रहे हैं। पहले इन बातों को दबा दिया जाता था। आज यह अच्छी बात है कि हर लड़की सोचती है कि वह अकेली नहीं है। आज वह खुद को दोषी मानने के बजाय दोषी का पर्दाफाश करती हैं। मैं जिन दिनों लोकल ट्रेन से सफर किया करती थी, तब मुझे चेंबूर से वीटी जाना होता था और कॉलेज के उन दिनों में अक्सर मुझे कोई पिंच कर देता, कोई चिकोटी काट देता। मुझे बहुत गुस्सा आता और मैं चिल्ला कर हाथ उठा देती थी। मुझे लगता है ऐसे मामलों में चुप नहीं रहना चाहिए। वैसे आज इंडस्ट्री में मुझे 12 साल हो गए हैं और मुझसे यहां ऐसी-वैसी हरकत करने की किसी की हिम्मत नहीं होती, मगर जब मैं कॉलेज में थी तो मैं भी छेड़खानी का शिकार हुई। मैं आपको एक वाकया बताती हूं। जब मैं कॉलेज में थी, एक आर्मी जवान वीटी स्टेशन पर खड़ा था और मेरी तरफ देखे जा रहा था। वह लगातार मेरे ब्रेस्ट को घूर रहा था और फिर उसने मेरी तरफ देखकर आंख मारी। गुस्से के मारे मेरे तन-बदन में आग लग गई, मैं उसके पास दनदनाती हुई गई और उससे जाकर कहा, ‘आप मेरी तरफ ऐसे क्या घूर रहे हैं? आपने मुझे देखकर आंख क्यों मारी ? आप हमारे देश के जवान हैं। देश की सुरक्षा का जिम्मा आपका है और आप मुझे आंख मार रहे हैं। ये क्या छिछोरापन है?’ मेरे साथ मेरी सहेली भी थी और वह लगातार मेरा हाथ खींचकर मुझे वहां से ले जाने की कोशिश कर रही थी, मगर मैं चुप नहीं रही। मेरी फटकार पर आर्मी जवान बहुत ही शर्मिंदा हो गया। सेक्सुअल हैरासमेंट की परिभाषा बहुत ही वृहद है। यह कुछ भी हो सकता है। हाथ लगाना, अश्लील बातें करना या मॉलेस्ट करना ही यौन शोषण नहीं होता, कई बार लोग आंखों ही आंखों में आपका बलात्कार कर देते हैं।

आपकी नजर में आदर्श होममेकर कौन हैं?

जाहिर-सी बात है, मैं तो अपनी मां का ही नाम लूंगी क्योंकि मैं एक मिडल क्लास परिवार से हूं। सीमित आमदनी के बावजूद मेरी मम्मी ने हमें कभी कोई कमी महसूस नहीं होने दी, जितना था हम उसमें खुश थे। जब कभी भी कुछ खरीदने की बात होती थी, तब हमेशा हमारी जरूरतों को प्राथमिकता दी जाती थी। मुझे आज भी याद है कि त्योहार पर मेरी मां कभी-कभार ही साड़ी लेती थीं और ब्लाउज वे हर महीने सिलवाती ही नहीं थीं। वे हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपना ब्लाउज एक महीने छोड़ कर सिलवाती थीं क्योंकि उस वक्त घर में सिर्फ मेरे पापा ही अर्निंग मेंबर थे। मुझे याद है कि मैं अपनी मां से पूछती थी कि उन्होंने साड़ी के साथ ब्लाउज क्यों नहीं सिलवाई तो वह कहतीं, अभी तो सिलवाया था, अब अगले महीने सिलवाऊंगी। उन्हीं की वजह से मैं जीवन में हर चीज की कीमत करना सीख पाई हूं। मेरी मां बहुत ही अच्छी मैनेजर भी रहीं और साथ ही दयालु भी। उनके पास काम करके जा चुके लोग आज भी उनके सम्पर्क में हैं और वह आज भी उनकी मदद करती हैं। उनके लिए जॉब्स ढूंढती हैं। मैंने मां को बीमारी में भी काम करते देखा। वाकई उन्हें रविवार को भी घर के कामों से छुट्टी नहीं मिलती थी। आज घर में नौकर-चाकर हैं और इडली डोसा का बैटर पीसने की मशीन है, मगर मेरी मां उस जमाने में अपने हाथों से इडली-डोसा का बैटर खुद पीसा करती करती थीं। उसमें बहुत मेहनत और समय लगता था।

आपके पति सिद्धार्थ रॉय कपूर बॉलिवुड के जाने-माने निर्माता हैं। क्या आप करियर से जुड़े फैसलों में उनसे सलाह लेती हैं?

यह बहुत ही अच्छी बात है कि सिद्धार्थ बिलकुल भी कोई अडवाइज नहीं देते। हमेशा से ही मैं अपनी फिल्में खुद चुनती हूं क्योंकि कल को कुछ गड़बड़ हो गई तो इसका जिम्मेदार मैं खुद को मानूंगी। उन्हें दोष नहीं दूंगी। वे मेरी सिर्फ इतनी मदद करते हैं कि हमेशा मुझे फिल्में चुनने से पहले सोचने-विचारने के लिए प्रेरित करते हैं। वे हमेशा कहते हैं, फिल्म चुनने के मामले में जल्दबाजी मत करो। फिल्मों के मामले में अंतिम फैसला मेरा अपना होता है।

शादी के मामले में ऐसी कौन-सी चीज है, जिसे लेकर आप समझौता नहीं करतीं?

मैं घर का खाना नहीं बनाती। मुझे खाना बनाने का शौक नहीं और दूसरी बात मैं उनके घर में चप्पल पहनकर घूमना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करती। उनके घर में जूते-चप्पल पहनकर घूमने को बुरा नहीं समझा जाता था। मगर मैंने उनसे कह दिया कि ये घर में नहीं चलेगा। घर में पहनने के चप्पल अलग से रखें। हमारे दक्षिण भारतीय परिवार में घर में जूते पहनकर घूमना बिल्कुल भी गंवारा नहीं होता। बाहर के जूते-चप्पल से घर में कीटाणु भी तो आते हैं।

मदरहुड के बारे में क्या सोचती हैं?

मुझे ऐसा लगता है कि कभी भविष्य में मैं और सिद्धार्थ तैयार हुए मदरहुड को लेकर तो फैमिली आगे बढ़ेगी। नहीं तो फिलहाल हम दो के परिवार में ही बहुत खुश हैं।

एक समय था, जब लोग कहा करते थे कि फिल्मों को सफल बनाने के मामले में विद्या के पास ‘पारस’ स्पर्श है, मगर एक अरसे से ‘कहानी 2’, ‘बेगम जान’ जैसी आपकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर वो चमत्कार नहीं दिखा पा रही हैं?

अब वह टच नहीं रहा (हंसती हैं) ये तो मजाक की बात हुई, मगर मैं अपने आपको हर तरह से बहुत ही खुशकिस्मत मानती हूं। फिल्में चलें या न चलें, मगर लोगों का प्यार मेरे प्रति कभी कम नहीं हुआ और यही मेरी असली कमाई है। जहां तक फिल्मों के न चलने का सवाल है तो मुझे लगता है कि स्थापित हो जाने के बाद निर्देशक आलसी हो जाते हैं और वे कलाकारों को फॉर ग्रांटेड ले लेते हैं। उनको लगने लगता है कि इस ऐक्टर से कुछ भी करवाएंगे तो चल जाएगा। कभी उनका यह रवैया और कई बार स्क्रिप्ट का सेट पर एग्जिक्यूट न हो पाना फिल्म के लिए घातक साबित हो जाता है। मैं यह भी कहना चाहूंगी कि फिल्म के चलने या न चलने का कोई सेट तरीका नहीं होता। किन्हीं कारणों से जो एक फिल्म चलती है, उन्हीं कारणों से दूसरी फिल्म नहीं चलती। मैं अपने आपको फिल्मों के मामले में खुशकिस्मत मानती हूं जो मुझे अब तक विविधतापूर्ण रोल्स मिले हैं। मैंने भी उन्हें निभाने के मामले में कोई कसर नहीं छोड़ी।

आपकी फिल्म ‘तुम्हारी सुलु’ हाउसवाइफ के सपनों पर आधारित है। आमतौर पर हमारे समाज में एक गृहिणी को नीची निगाह से देखा जाता है और गृहिणियां भी खुद को नकारा मानती हैं?

ये सोच बहुत गलत है। असल में ग्रहणियां और दूसरे लोग उनको कमतर इसलिए भी मानते हैं कि उनकी नजर में घर के काम की कोई कीमत नहीं होती। उस काम के लिए उन्हें पैसे नहीं मिलते। मैं जब चौथी क्लास में थी तो मेरी क्लास टीचर रॉड्रिक्स ने हमें एक दिन बताया कि आपकी मां जितना काम घर पर करती हैं, उसी की वजह से आप स्कूल आ पाते हो और उसी के कारण आपके पापा काम पर जाकर पैसे कमा पाते हैं। आपको अपनी मां का हमेशा धन्यवाद अदा करना चाहिए। उनके समझाने के बाद मैं उसके बाद हमेशा अपनी मां को थैंक्स कहने लगी थी। मम्मी को मेरा थैंक्स कहना बहुत अजीब लगता था, मगर उसके सही मायने में इसके अर्थ मुझे बड़े होने के बाद समझ में आए। जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई, मेरी समझ में आया कि घर को संवारने में एक होममेकर का कितना बड़ा हाथ होता है। कई बार औरतें आकर मुझसे कहती हैं कि हम तो कुछ नहीं करते, बस हाउसवाइफ हैं तो मैं उन्हें उनके अस्तित्व का अहसास कराती हूं। अब जैसे मैं अपने घर का कोई घरेलू काम नहीं करती, मगर इसके बावजूद सब कुछ मैनेज करती हूं। औरतों को हमेशा दोहरी जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है।

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